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pmadhwal
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कितना ग्रीन है आपका...
Posted On 18/11/2008 09:50:48

ग्रीनपीस द्वारा जारी एक ताजा सर्वे में यह खुलासा किया गया है कि ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के लिए कम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक सामान बनानेवाली कंपनियां फिसड्डी साबित हो रही हैं


यह तीसरी बार है जब ग्रीनपीस इंडिया ने कंम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक सामान बनानेवाली कंपनियों की एक रैकिंग जारी की है. इस रैंकिग में सिर्फ सोनी और सोनी इरिक्शन को छोड़कर कोई भी भारतीय कंपनी 10 में से 5 अंकों को भी नहीं पा सकी है. ग्रीनपीस ने समग्र रूप से एक ऐसी पद्धति विकसित की है जिससे यह अंदाज लगाया जाता है कि किसी इलेक्र्ट्रानिक कंपनी द्वारा जो उत्पाद बनाये जा रहे हैं वे उर्जा संरक्षण में कितना योगदान दे रहे हैं, कंपनियां अपने उत्पादों में जो रासायनिक उपयोग कर रही हैं वे पर्यावरण को किस मात्रा में नुकसान पहुंचाती है और कंपनी द्वारा बनाये गये उत्पाद के अंत पर पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचता है. 


ग्रीनपीस लगातार यह अभियान चला रहा है कि भारत में कम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक कंपनियां न केवल उर्जा संरक्षण करनेवाले उत्पाद बनाएं बल्कि खतरनाक और दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्रतिबंधित केमिकल्स के प्रयोग पर भी रोक लगाएं. ग्रीनपीस की ओर से जो 15 मानदंड तैयार किये गये हैं उनमें तीसरी बार एचसीएल फिसड्डी कंपनी साबित हुई है. अपने उत्पादों को पीवीसी प्लास्टिक से मुक्त रखने, पुनर्शोधित प्लास्टिक का प्रयोग करने, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने, परंपरागत उर्जा पर निर्भरता बढ़ाने और उत्पादों को कम उर्जा के खपत के लिए तैयार करने के मसले पर वह पूरी तरह से विफल रही है. लेकिन ऐसा नहीं है कि एसचीएल इस बारे में काम नहीं कर रहा है. रिपोर्ट कहती है कि जरूरी संरक्षा उपायों को लागू करने के लिए कंपनी पहल कर रही है. प्रतिबंधित रसायनों को अपने उत्पादों से अलग करने के लिए एसचीएल बहुत तेजी से जरूरी कदम उठा रहा है.


बदतर से बेहतरः पीसीएस (सबसे बदतर), निन्तेन्दो, जेनिथ(Zenith), माइक्रोसाफ्ट(Microsoft), विप्रो(Wipro), एलजी(LG), एसचीएल(HCL), एफसएससी, फिलिप्स(Philips), लेनोवो(Lenovo), शार्प(Sharp), एप्पल(Apple), एचपी(HP), मोटोरोला(Motorola), पैनासोनिक(Panasonic), एसर(Acer), तोसिबा (Toshiba), डेल(dell), सैंमसंग(Samsung), नोकिया(Nokia), सोनी(Sony), सोनी एरिक्शन (सबसे बेहतर)लेकिन इस रैंकिग में सबसे बुरी गत है पीसीएस की. पीसीएस देशी कम्प्युटर निर्माता कंपनी है और हर मानदण्ड पर पूरी तरह से फेल हुई है. पीसीएस के कम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक सामान निर्धारित 15 मानदण्डों में से किसी पर भी खरे नहीं उतरते. पीसीएस के कम्प्युटर न तो उर्जा की बचत करते हैं, न पीवीसी प्लास्टिक के उपयोग पर किसी प्रकार की रोक लगा रहे हैं और न ही आगे की उनकी कोई योजना ऐसी दिखाई देती है कि आनेवाले दिनों में कंपनी इस दिशा में कोई कदम उठायेगी. देश की एक दूसरी बड़ी कंम्प्यूटर निर्माता कंपनी जेनिथ कम्प्यूटर्स का भी यही हाल है. हालांकि जेनिथ कम्प्यूटर्स ने पीवीसी प्लास्टिक के उपयोग को बहुत तेजी से युक्तिसंगत और पर्यावरण के अनुकूल बनाया है लेकिन रसायनों के इस्तेमाल, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए जरूरी उपाय और उर्जा संरक्षण जैसे मुद्दों पर यह कंपनी अभी भी फिसड्डियों की ही श्रेणी में है. ग्रीनपीस रैंकिंग में यह कंपनी दस में से मात्र एक नंबर हासिल कर सकी है.


वैसे ग्रीनपीस के बनाये मानदण्डों पर विप्रो के कंम्प्यूटर भी खरे नहीं उतरे हैं. ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, उर्जा संरक्षण, परंपरागत उर्जा के उपयोग और पीवीसी प्लास्टिक से उत्पादों को ज्यादा सुरक्षित बनाने के मसले पर विप्रो भी असफल साबित हुई है. हां कंपनी ने एक निर्णय जरूर किया है कि वह एक समय सीमा के भीतर अपने उत्पादों से पीवीसी के प्रयोग को बंद कर देगी. ग्रीनपीस के अभिषेक प्रताप बताते हैं कि सोनी इरिक्शन ही एक ऐसी कंपनी है जो लगभग हर कसौटी पर खरी उतरती हैं." अभिषेक प्रताप बताते हैं कि भारत में जितने बड़े बहुराष्ट्रीय ब्राण्ड हैं वे सब भारत आकर गैरजिम्मेदार व्यवहार करने लगते हैं. आज देश में इलेक्ट्रानिक उत्पाद बनानेवाली जितनी कंपनियां है उनमें से शायद ही कोई हो जो अपने उत्पाद को वापस लेकर उनके सुरक्षित निस्तारण की गारंटी लेती हों. अभिषेक कहते हैं कि दो बड़ी भारतीय कंम्प्यूटर निर्माता कंपनियों द्वारा इस तरह से पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के मुद्दे पर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार दिखाना बहुत दुखद है. 


क्या कहता है ग्रीनपीस (Greenpeace)


ग्रीनपीस के प्रचारक रमापति कुमार कहते हैं “हर उत्पादक को अपने सभी उत्पादों पर नजर रखनी होगी कि आखिरकार उसका अंत कैसे होता है. बिना इसके भारत में बढ़ते ई-कूड़े के संकट से निपटना बहुत मुश्किल होगा. वर्तमान में केवल 10 प्रतिशत इलेक्ट्रानिक उत्पाद ऐसे हैं जो वैध तरीके से निपटाये जाते हैं.” ज्ञात हो कि इस समय भारत में हर साल 3 लाख टन ई-कूड़ा पैदा होता है जो साल 2012 तक बढ़कर 10.6 लाख टन हो जायेगी.


यहां एक बात जानने लायक है कि उत्पाद के डिजाईन के दौरान ही अगर सावधानी बरती जाए तो ई-कूड़े के खतरे को बहुत कम किया जा सकता है. इसीलिए ग्रीनपीस लगातार “उत्पादक की जवाबदेही” तय करने के लिए अभियान चला रहा है. उत्पाद के डिजाईन स्तर पर ही उसे पर्यावरण अनुकूल बनाने का प्रयास करना चाहिए न कि तब जब उस उत्पाद को नष्ट किया जा रहा हो. ऐसे में उत्पादकों को जिम्मेदार बनाना ग्रीनपीस के अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है.


इस नजरिये से आप इलेक्ट्रानिक उत्पादन करनेवाली भारतीय कंपनियों को देखेंगे तो पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बनाने के अपने प्रयासों में वे अपनी समवर्ती विदेशी कंपनियों से बहुत पीछे नजर आते हैं. इससे जाहिर होता है कि भारतीय कंपनियां पर्यवारण अनुकूल उत्पाद बनाने में बहुत उत्साहित नहीं हैं. ऐसे में ग्रीनपीस की यह रैंकिग गाईड बड़े उत्पादकों के लिए एक चुनौती है कि एक समयसीमा के अंदर वे पर्यावरण अनुकूल उत्पादन को अपने यहां पूरी तरह से कैसे लागू करते हैं. यहां एक बात यह भी ध्यान में रखने की है कि भारतीय कंपनियों को समझना चाहिए कि ई-कूड़े की समस्या से तब तक नहीं निपटा जा सकता जब तक कि भारतीय कंपनियां पूरी तरह से बचाव की रणनीति पर काम नहीं करती. अभी भारतीय कंपनियों का ढर्रा है कि वे कूड़े को मैनेज करना चाहती है जबकि अच्छा रास्ता है कि उत्पाद को ही ज्यादा पर्यावरण अनुकूल बनाया जाए. उन केमिकल और रसायन को कम से कम उपयोग में लाया जाए जो मानवीय स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं.


इस बारे में भारतीय कंपनियों को जल्द ही वैश्विक नीति अपनानी होगी कि वे अपने उत्पाद को कितना पर्यावरण अनुकूल बना पाते हैं. यही भारत के पर्यावरण और व्यवसाय दोनों के हित में है. अगर विश्व बाजार में भारतीय कंपनियों को टिके रहना है तो अविलंब उन्हें इस रणनीति पर काम करना होगा. 

http://www.visfot.com/paryavaran/266.html


आठ साल, वही सवाल
Posted On 13/11/2008 07:28:05
छोटे राज्य बने थे कि प्रदेशों का समुचित विकास हो सके. लेकिन हुआ क्या? आप उत्तराखण्ड को देखिए. उत्तराखंड देश का एक ऐसा राज्य है जहां प्रकृति ने अपना पूरा खजाना लूटा रखा है, यहां प्राकृतिक संसाधनों की कमी नहीं, यहां के रमणीक स्थल स्विटजरलैंण्ड से कम नहीं, यहां के लोगों में देश के लिए मर मिटने का जज्बा है लेकिन फिर भी पहाड़ राज्य बनने के पहले जहां था बनने के आठ साल बाद भी वहीं खड़ा है. आखिर वह कौन सी वजह है जो यह प्रदेश इन आठ सालों में वह तरक्की नहीं कर पाया जो इसे करनी चाहिए थी.

भारतीय गणराज्य के राजनैतिक मानचित्र पर नौ नवम्बर 2000 की मध्यरात्री से अस्तित्व में आये देश के 27 वें राज्य के रूप में स्थान पाने वाला यह पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड पूरे आठ साल का हो गया है, और आम आदमी को बिजली, पीने का पानी और जीवन की गाड़ी ढोने के लिये अब भी सडक़ों का इन्तजार है। डाक्टर और शिक्षकों का रोना तो आम पहाड़ी लोग अब भी रो रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या अब भी रोजगार की है जिसकी तलाष में यहां के बेरोजगारों का पलायन रूकने का नाम ही नहीं ले रहा है। पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की किरण न पहुंच पाने के कारण पिछले 10 सालों में 12लाख से ज्यादा परिवारों ने प्रदेश के तराई वाले क्षेत्रों की ओर रूख किया है। जिससे पर्वतीय क्षेत्र की जनसंख्या कम हुई है।

उत्तराखण्ड राज्य के गठन के समय 10 करोड़ के ओवरड्राफ्ट के साथ इस राज्य का सरकारी कामकाज शुरू हुआ था और आज इसका नान प्लान का बजट ही छह हजार करोड़ के बराबर है। इसी तरह राज्य की सालाना योजना उस समय हजार करोड़ से कम थी जोकि आज 4778 करोड़ तक पहुंच गयी है। यही नहीं राज्य ने कई क्षेत्रों में पुराने और स्थापित राज्यों को भी पीछे धकेलने में सफलता हासिल की है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इस नये राज्य की जिस तरह से बुनियाद रखी गयी थी उस हिसाब से यह चल नहीं रहा है। पिछले दो सालोंं में तो विकास में ठहराव सा आ गया।

९ नवंबर २००८ को उत्तराखण्ड राज्य स्थापना के आठ साल पूरे हो गयेराज्य सरकार के अर्थ एवं संख्या विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में गरीबी की सीमा रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों की संख्या 623790 तक पहुंच गयी है राज्य गठन के समय यह संख्या तीन लाख 75 हजार के करीब थी। उत्तराखण्ड की 3805 बस्तियां घोर पेयजल संकट से तथा 12247 बस्तियां आंशिक पेयजल संकट से जूझ रही हैं। प्रदेश की लगभग समूची और खास कर ग्रामीण, गरीब और पहाड़ी आबादी पूरी तरह सरकारी चिकित्सा व्यवस्था पर निर्भर है और सरकार 50 फीसदी अस्पतालों में डाक्टर नहीं करा पा रही है। राज्य के गठन से पहले भी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या स्कूलों में शिक्षकों और अस्पतालों में डाक्टरों के अभाव की रही है। राज्य गठन के आठ साल बाद भी इस पहाड़ी राज्य में निरक्षरों की संंख्या कुल 84 लाख की आबादी में से 3383567 है। इसी तरह बेरोजगारों की संख्या सात लाख तक चली गयी है।

राज्य सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश के रूप में अस्तित्व में आने के बाद भी उत्तराखण्ड के कई गांवों के लोगों को एक गगरी पानी के लिये पांच किलोमीटर से भी दूर जाना पड़ता है। इसी तरह 239 गांवों के बच्चों को जूनियर हाई स्कूल में पढऩे के लिये पांच कि.मी. से दूर जाना पड़ता है। सरकारी रिकार्ड के अनुसार 2470 गांवों से सीनियर बेसिक स्कूल बालक, 7432 गांवों को सीनियर स्कूल बालिका 3695 गावों के लिये हायर सेकेण्डरी स्कूल पांच कि.मी से दूर है। इसी तरह 8716 गांवों के लिये ऐलोपैथिक अस्पताल भी पांच कि.मी. से दूर हैं। 2229 गांव ऐसे हैं जो कि पक्की सडक़ों से दूर हैं और उनमें बहतरा जैसे दर्जनों गांव हैं जो सडक़ से 30 कि.मी. से अधिक दूर हैं। 2646 गांवों के लिये बस स्टाप अब भी पांच कि.मी दूर से दूर हंै। रेलवे स्टेशन तो 15069 गांवों की पहुंच से दूर हैं।

दशकों के संघर्ष के बाद नौ नवम्बर सन् 2000 को अस्तित्व में आने वाले उत्तराखण्ड राज्य ने आठ सालों में चार मुख्यमंत्री देखने के साथ ही कई राजनीतिक उतार चढ़ाव भी देख लिये। इन गुजरे वर्षों में शायद ही कोई ऐसा महीना रहा हो जब मुख्यमंत्री बदलने या सत्ताधारी दलों में उथल पुथल की चर्चाएं गर्म नहीं रही हों। इस तरह की राजनीतिक अस्थिरता के कारण इस राज्य में विकास की गाड़ी अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाई। यहां तक कि नारायण दत्त तिवारी जैसा देश का सर्वाधिक अनुभवी राजनेता भी काफी कुछ करने के बाद भी उतना तो नहीं कर पाया जितना वह सोच कर उत्तराखण्ड आये थे।

उत्तराखण्ड में मार्च 2007 से सत्ता परिवर्तन के साथ ही विकास का पहिया तो लगभग ठहर सा गया है। खुद मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी ने स्वीकारा है कि इन दो सालों के दौरान पांच चुनाव आ जाने से बार-बार चुनावी आचार संहिता लगती रही और विकास अवरुद्ध होता रहा। इन दो सालों में प्रदेश में एक भी उद्योग नहीं लगा। इसके विपरीत टाटा की महत्वाकांक्षी परियोजना नैनो प्रदेश के हाथ आते- आते सरकार की लापरवाही से गुजरात चली गयी। इन दो सालों में कोई नया उद्योग तो इस प्रदेश में लगा नहीं परन्तु भाष्कर इनर्जी और हौण्डा जैसे उद्योग लाल फीताशाही के चलते यहां से खिसक गये। पंडित नारायण दत्त तिवारी ने इसे उर्जा राज्य बनाने की घोषणा की थी और उनके कार्यकाल में कई बिजली परियोजनाओं पर काम भी शुरू हुआ मनेरी भाली उन्होंने ही शुरू की थी। लेकिन मौजूदा सरकार के कार्यकाल में नयी परियोजनाऐं तो शुरू हुयी नहीं मगर दो बड़ी महत्वपूर्ण परियोजनाऐं अवश्य स्थगित हो गयीं। बीस सूत्रीय कार्यक्रम गरीबी उन्मूलन और समाज के आर्थिक तथा सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के उत्थान के लिये शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम की प्रगति से ही पता चलता है कि किस राज्य में आम लोगों की भलाई के लिये क्या हो रहा है। तिवारी के शासन में उत्तराखण्ड देश में लगातार चार बार पहले स्थान पर रहा और अब यह प्रदेश और नीचे सातवें स्थान पर जा पहुंचा है।

गांवों में सडक़, बिजली, और पानी जैसी मलभूत सुविधाओं के लिये भी काम ठप्प पड़े हैं। इसीलिये कई लोगों का मानना है कि प्रदेश की सत्ता लखनऊ से कुछ नेताओं और अधिकारियों की मौज के लिये ही देहरादून पहुंची है और आम आदमी की हालत जस की तस है। प्रदेश में विधायकों के 70 पद पहले से ही थे एक पद मनोनयन का फिजूल में ही बढ़ गया। इसके बाद 12 पद मंत्रियों के और जिन्हें मंत्री नहीं बनाया जा सका उनके लिये पिछले दरवाजे से सैकड़ों पद बना दिये। यह बात दीगर है कि आम आदमी के बेटे बेटी के लिये छोटी सी भी नौकरी नहीं है। यही कारण है कि रोजगार की तलाश में आज भी पहाड़ का युवा मैदानी इलाकों की ओर रूख कर रहा है। और तो और पर्वतीय क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में वहां जीवन बसर कर रहे ऐसे लोग जो अब कहीं जाकर रहने की स्थिति में आ चुके हैं वे भी इन पर्वतीय इलाकों को छोडक़र मैदान की ओर रूख करने लगे हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव इस पहाड़ी क्षेत्र पर पड़ रहा है। राजनैतिक दृष्टि से भी इस क्षेत्र का नुकसान ही हुआ है। यहां जनसंख्या कम होने के कारण विधानसभा सीटें घटी हैं जिसका प्रतिकूल प्रभाव यहां के विकास कार्यों पर पड़ेगा। क्योंकि विधानसभाओं के कम होने से यहां के विकास कार्यों पर खर्च होने वाली विधायक निधि भी अन्य स्थानों पर खर्च होगी। 


http://www.visfot.com/voice_for_justice/493.html


उत्तराखण्ड में भाजपा चली...
Posted On 28/10/2008 01:59:41
राजनीति भी क्या चीज है। उत्तराखण्ड में लगभग तीन साल पहले जो कांग्रेस ने किया वही इतिहास अब भाजपा भी दोहराने जा रही है। जिन मुद्दों को जनता के बीच भुनाकर भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आयी थी आज भाजपा भी उसी राह पर चल निकली है। इसे कहते हैं राजनैतिक मजबूरी उस समय भाजपा की समझ में नहीं आ रहा था कि कांग्रेस ने आखिर ऐसा क्यों किया। लेकिन अब भाजपा के मुख्यमंत्री की समझ में आ गया है कि सरकार को बचाने के लिए वह सब कुछ करना पड़ता है जो पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने किया था। अब भाजपा जनता को क्या जवाब देगी, कि आखिर उसने सत्ता हासिल करने के लिए ऐसा क्यों किया?

प्रदेश में काबिज पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के शासनकाल के दौरान बांटी गई लाल बत्तियों के विरोध के बूते सत्ता हासिल करने वाली भाजपा सरकार भी अब उसी राह पर चल निकली है। यही कारण है भाजपा सरकार द्वारा प्रदेश के 23 पदों को आफिस आफ प्रोफिट की श्रेणी से बाहर करने को इसी रणनीति के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है कि अब भाजपा सरकार भी अपने प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ ही कुछ विधायकों को लाल बत्ती से नवाजने जा रही है यह वही भाजपा है जिसने विधानसभा चुनाव में लालबत्ती को मुद्दा बनाया था और इस समेत कई अन्य मुद्दों के साथ ही वह कांग्रेस के सामने खड़ी थी, और कांग्रेस से सत्ता छीनने में कामयाब हुई थी।

उल्लेखनीय है कि प्रदेश में काबिज भाजपा बीते विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस सरकार द्वारा बेतहाशा लालबत्तियों के आवंटन, मुख्यमंत्री राहत कोष के आवंटन के साथ ही फिजूल खर्ची सहित उद्योगपतियों को रियायतें दिये जाने को मुद्दा बनाकर सत्ता में आई थी। इतना ही नहीं भाजपा ने कांग्रेस द्वारा गार्डनर को विधानसभा में एंग्लो इंडियन सदस्य के रूप में नामित किये जाने को भी मुद्दा बनाया था और वह इसके खिलाफ राज्यपाल से लेकर उच्च न्यायालय तथा चुनाव आयोग तक में गयी थी। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में यह साफ दिखाई देने लगा है कि भाजपा सरकार भी उसी कांग्रेसी सरकार के पद चिन्हों पर चलती नजर आ रही है। बीते दिन भाजपा सरकार ने जहां अपने कार्यकर्ताओं तथा विधायकों में सरकार के प्रति उठ रहे विरोध के स्वरों को दबाने के लिए प्रदेश के तमाम विभागों के 23 पदों को आफिस आफ प्रोफिट के दायरे से बाहर कर उन्हे इन पदों पर एडजस्ट करने की कवायद शुरू कर दी है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार अगले कुछ दिनों में कई भाजपाईयों को इन पदों पर बैठा दिया जाएगा इसके लिए भाजपा संगठन ने सूची बनानी शुरू कर दी है कि किस कार्यकर्ता को किस पद पर एडजस्ट किया जायेगा। ईधर भाजपा सूत्रों का कहना है कि सरकार इन्हे केवल दायित्वधारी तक ही सीमित करना चाहती है तथा इन पदों पर काबिज कार्यकर्ताओं को मानदेय भी दिया जाएगा।

दायित्वों से नवाजे जाने के मामले पर नेता प्रतिपक्ष डा0 हरक सिंह रावत का कहना है कि तिवारी सरकार ने तो सरकार के तीन साल बाद अपने कार्यकर्ताओं को दायित्वधारी बनाया जबकि भाजपा ने मात्र 20 महीने में ही अपने कार्यकर्ताओं को दायित्वों से नवाजने की तैयारी कर दी है। उनका कहना है कि नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली भाजपा को भी यही सब करना था तो उसने कांग्रेस की आलोचना क्यों की थी और प्रदेश की जनता को क्यों झूठे सपने दिखाये थे। मामले में डा0 हरक सिंह रावत का साफ कहना है कि मुख्यमंत्री अपने खिलाफ उपजे असंतोष को दबाने के लिए यह सब कर रहे हैं।

उन्होने कहा कि पूर्व कांग्रेस सरकार ने लालबत्ती से नवाजे गये दायित्वधारियों को केवल बैठक में जाने के दौरान ही टैक्सी किराया व मामूली रकम को मानदेय के रूप में देने की ही अनुमति दी थी लेकिन कांग्रेस सरकार पर फिजूलखर्ची का आरोप लगाने वाली भाजपा ने अब इससे आगे बढक़र अपने कार्यकर्ताओं को दायित्वों के साथ ही मानदेय में कई गुना बढ़ोत्तरी कर इसे साढ़े आठ हजार से दस हजार रूपये तथा असीमित यात्रा व्यय तक देने के आदेश दिये हैं। उन्होने कहा जहां तक कांग्रेस शासनकाल में मुख्यमंत्री राहत कोष की बंदरबांट का मामला भाजपा द्वारा उठाया गया और इसे चुनावी मुद्दा तक बनाया गया लेकिन स्थिति इसके एकदम उलट है। प्रदेश सरकार ने जिस आरएसएस के व्यक्ति को इसे बांटने का जिम्मा सौंपा है उसकी पौ बारह हो गयी है। अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपने को देय की कहावत यहां चरितार्थ हो रही है प्रदेश मुख्यमंत्री के विवेकाधीन कोष का जमकर दुरपयोग किये जाने की शिकायतें आम हो गयी है।

इस मामले पर कांग्रेस के नेता व नेता प्रतिपक्ष डा0 हरक सिंह रावत का तो साफ कहना है कि तिवारी जी के शासनकाल में उन पर उंगली उठाने वाली भाजपा तो उससे आगे चल निकली है। उनका कहना है कि कांग्रेस शासनकाल में मुख्यमंत्री राहत कोष का लाभ प्रदेश के हर उस जरूरतमंद व्यक्ति को मिला जिसको जरूरत थी लेकिन वर्तमान सरकार ने इसे आरएसएस कोष बनाकर रख दिया है और जिस जरूरतमंद व्यक्ति को विवेकाधीन कोष से आर्थिक सहायता की जरूरत है उसे धक्के खाने पड़ रहे हैं। कांगे्रसी नेता का कहना है कि मितव्ययता की बात करने वाली भाजपा सरकारी संसाधनों का जमकर दुरपयोग कर रही है। मंत्रिमंडल की बैठक में कोरम पूरा करने के लिए बीमार मंत्रियों को हैलीकाप्टर से लाया जा रहा है। सरकार संवेदनहीन हो चुकी है इसका उदाहरण यह है कि बीते दिनों हुई बस दुर्घटनाओं में घायलों को यदि हैलीकाप्टर से पहाड़ी क्षेत्रों से अस्पतालों तक पहुंचाया जाता तो कई घायल बच सकते थे लेकिन सरकार के पास उनके लिए समय नहीं है। मुख्यमंत्री केवल हवाई जहाज अथवा हैलीकाप्टर से यात्रा कर रहे हैं। दुर्घटनाओं के बाद अस्पतालों में जीवन मौत से जूझ रहे घायलों को देखने का वक्त न तो मुख्यमंत्री के पास है और न उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों के पास। 

http://in.mg50.mail.yahoo.com/dc/launch?.rand=2ag1jggkpukip


रामदेव की गंगा रक्षा
Posted On 01/10/2008 11:16:48

जेपी इंडस्ट्रीज रामदेव के योगग्राम में पैसा लगाता है और गंगा रक्षा का दावा करनेवाले बाबा रामदेव गंगा रक्षा के पांच सूत्रीय मांगों में गंगा एक्सप्रेस हाईवे का जिक्र करना भी भूल जाते हैं. इससे गंगा रक्षा मंच और उद्योगपतियों के अन्तर्सम्बन्धों से हकीकत खुद बखुद सामने आ गई है। वैसे भी गंगा में जो भी उतरेगा उसे कपड़े उतारने पडेंगे। और कपड़े उतरेंगे को बहुत कुछ दिखेगा। दामन पर लगे दाग गंगा बाद में धोएगी पहले तो वह सार्वजनिक होगा। वही बाबा रामदेव के साथ हो रहा है।

योग आसनों और प्राणायाम का बाजारु संस्करण उतार कर दुनिया भर में प्रसिद्ध हुए योग गुरु बाबा रामदेव की निगाह गंगा और उसके पानी पर है। बाबा अब गंगा का कचरा साफ करने उतरे हैं। पिछले कुछ वर्षों में बाबा के योग-प्राणायाम से ठीक हुए लाखों बीमार अब उनके भक्त हैं। उनके ही दम पर बाबा राजनीति की शुद्धता की भी बात करते हैं। गंगा के निर्मलीकरण का अभियान उनकी राजनीति का ही हिस्सा दिखाइ दे रहा है। अगर यह उनकी राजनीति है तो उसमें वह सफल हैं। क्योंकि विहिप के प्रभुत्व वाले गंगा रक्षा मंच के बैनर तले केन्द्रीय गृह राज्यमन्त्री श्रीप्रकाश जयसवाल भी आए और उन्होंने बाबा को प्रधानमन्त्री से मिलने का समय भी दिलाया। जहां तक श्रीप्रकाश जयसवाल का गंगा की शुद्धता के लिए चिन्तित होने का प्रश्न है तो चुनावी साल में वह स्वाभाविक था। लेकिन बाबा का सारा क्रिया कलाप उनके तथाकथित राजनैतिक शुद्धतावाद से परे था।

पहली बात। बाबा ने गंगा रक्षा मंच के बैनर तले एक हस्ताक्षर अभियान चला रखा है। हस्ताक्षर अभियान गंगा के सवाल पर केन्द्रीय एवं सम्बन्धित राज्य सरकारों के समक्ष प्रस्तुत मांग पत्र के समर्थन में है। मांग क्या है, इस पर गौर फरमाने की जरूरत है। एक- गंगा को राष्ट्रीय नदी / राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाए। दो- केन्द्रीय स्तर उच्चाधिकार सम्पन्न गंगा संरक्षण प्राधिकरण गठित किया जाए। तीन- प्रदूषित जल को निर्धारित मानकों के अनुरूप शोधित करने की व्यवस्था सुनिश्चित हो। चार- गन्दे नालों, कल-कारखानों के प्रदूषित जल एवं लावारिस पशुओं के शव आदि को गंगा जी में डालना संज्ञेय अपराध घोषित किया जाए। पांच- टिहरी बांध परियोजना के जो लाभ निर्धारित किए गए थे उनकी उपलब्धि के सम्बन्ध में केन्द्र सरकार एक श्वेत पत्र जारी करे।

मांगपत्र की पहली मांग को छोड दिया जाए तो क्या ऐसा नहीं लगता कि यह मांग पत्र राजनीति के सौदागरों और उद्योगपतियों ने बनाया है। मांग दो पर आइए। गंगा संरक्षण प्राधिकरण गठित होगा तो क्या होगा? सिवाय इसके कि विहिप और बाबा के कुछ चेले प्राधिकरण में नामित हो जाएंगे। देष में कितनी ही परियोजनाओं पर न जाने कितने ही प्राधिकरण बने हैं, उनका क्या हाल है? यह देश की जनता से छिपा नहीं है। मांग तीन पर आइए, प्रदूषित जल को मानकों के अनुरुप षोधन की बात है। क्या होगा? यही न कि गंगा किनारे कुछ सीवेज ट्रीटमेण्ट प्लाण्ट और लग जाएंगे। कौन लगाएगा। कोई उद्योगपति, शायद विहिप और बाबा से जुडा हुआ। मांग पांच क्या है? श्वेत पत्र जारी करने की बात। श्वेत पत्र से क्या होगा? 

सवाल उठता है कि मंच ने, बाबा ने गंगा के अविरल बहाव की बात क्यों नहीं की? क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो भागीरथी पर, गंगा पर बनने वाले बांधों का निर्माण रोकना पडेगा । टिहरी बांधको तोडकर गंगा की धारा को मुक्त करना पडेगा। टिहरी बांध किसने बनाया जे पी इण्डस्ट्रीज ने। जिसके पास गंगा एक्प्रेस हाइवे का भी ठेका है इसलिए मांगपत्र में गंगा एक्सप्रेस हाइवे से सम्बन्धित कोइ बात नहीं है। सवाल है कि क्या गंगा रक्षा मंच और बाबा रामदेव गंगा एक्सप्रेसवे को गंगा के लिए खतरा नहीं मानते। अब अगर लोग गंगा रक्षा मंच और बाबा रामदेव की नीयत पर सवाल न करें तो क्या करें? गोविन्दाचार्य ने तो 17 जून को ही मंच की विश्वसनीयता पर सन्देह व्यक्त कर दिया था, मंच वालों के सामने ही। और खुद को मंच से अलग कर लिया था। लेकिन अब तो लोग भी सन्देह कर रहे हैं।

दूसरी बात- मंच की विश्वसनीयता और बाबा की नीयत पर सन्देह पर और भी कारण हैं। 17 जून को जिस गंगा रक्षा मंच का निर्माण किया गया और जिसका ढिंढोरा पीटा गया वह तो आठ साल पुराना है। और इन्हीं बाबा रामदेव का बनाया हुआ है। बाबा रामदेव ने 12 फरवरी सन् 2000 को गंगा रक्षा मंच पता दादूबाग कनखल, हरिद्वार, फोन नं तत्कालीन 414107, 410008 के लेटर पैड पर प्रधानमन्त्री को एक चिट्ठी लिखी थी। चिट्ठी, प्रयाग में गंगा के सवाल पर आन्दोलनरत कुछ सन्तों की गिरफ्तारी के विरोध में था। चिट्ठी में मातृ सदन, हरिद्वार के हवाले से चेतावनी दी गई थी कि उनकी बात नहीं सुनी गई तो मातृ सदन के परमाध्यक्ष स्वामी शिवानन्द प्राण त्याग देंगे। पत्र में नीचे बतौर संयोजक स्वामी रामदेव और सहसंयोजक स्वामी संविदानन्द के हस्ताक्षर थे । तब क्या हुआ मालूम नहीं लेकिन अब फिर से गंगा रक्षा मंच बनाने का ढोंग क्यो ?

तीसरी बात- अब तो सन्देह यहां तक पहुंच गया है कि बाबा रामदेव सचमुच गंगा को बचाना चाहते हैं या गंगा के बहाने निशाना कहीं और है। इसका जवाब भी हरिद्वार से ही मिलता है। तारीखों पर ध्यान दीजिए। हरिद्वार में औद्योगिक क्षेत्र में 9 जून को बाबा रामदेव के योगग्राम का शिलान्यास हुआ और 17 जून को गंगा रक्षा मंच का गठन। शिलान्यास करने वाले थे उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री बी सी खण्डूरी। शिलान्यास पट्ट पर खण्डूरी के अलावा जे पी इण्डस्ट्रीज के मालिक जे पी गौड़, हीरो होण्डा कम्पनी के चेयरमैन वी एन मुंजाल और हरियाणा के प्रमुख उद्योगपति मित्रसेन आर्य का नाम है। साफ जाहिर है कि शिलान्यास पट पर इनका नाम फोकट में तो नहीं होगा. क्योंकि ये न तो कोई समाजसेवी हैं न ही कोई बडे पदवीधारी। क्या यह सवाल नहीं उठता कि बाबा अब खुद यह बताएं की इन उद्योगपतियों की योगग्राम के निर्माण में क्या भूमिका है? अगर जेपी गौड़ से पैसा लेकर योगग्राम बनता है तो फिर भला गंगा रक्षा मंच जे पी इंडस्ट्रीज के टिहरी बांध और एक्सप्रेस हाइवे के खिलाफ मोर्चा क्यों खोलेगा?

इतना ही नहीं, सवाल यह भी है कि बाबा रामदेव इन उद्योगपतियों के काले कारनामों को छिपाने की कोषिष तो नहीं कर रहे? बताते चलें कि उत्तराखण्ड की पिछली सरकार में हीरो होण्डा, एवरेडी, सोमानी फोम्स और वी आइ पी इण्डस्ट्रीज को फैक्टरी लगाने की अनुमति नहीं मिली। क्योंकि इन कम्पनियों का खतरनाक रासायनिक कचरा सीधे गंगा में गिरने वाला था। इन कम्पनियों को प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड की ओर से अनापत्ति प्रमाण पत्र न देनेवाले अधिकारी वी एस नेगी को सरकार ने स्थानान्तरित कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय के वाद संख्या 6023/2006 से सारी बातें साफ हो जाती हैं। स्थानान्तरण के खिलाफ उत्तराखण्ड उच्चन्यायालय में वाद दाखिल किया। फैसला नेगी के पक्ष में हुआ और राज्य सरकार हार गई। फैसले के खिलाफ राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की। जहां मुकदमा चल रहा है। अब मुकदमें में अपने आर्थिक हितों का हवाला देकर राज्य सरकार के साथ ये कम्पनियां भी खडीं हैं। शायद यही वजह है कि देश के जाने माने वकील सोली सोराबजी और फाली एस नरीमन समय समय पर राज्य सरकार के पक्ष में खडे होते हैं।

http://www.visfot.com/news_never_die/ramdev_ganga.html


गूगल गणराज्य के १० साल
Posted On 28/09/2008 02:20:25

गूगल की सफलता की कहानी समझने के लिए उस दौर को समझना होगा जब वेब पन्ने इतने हो गये थे कि डायरेक्टरी की जरूरत महसूस होने लगी थी. यह काम गूगल ने नहीं किया. सबसे पहले यह काम याहू के संस्थापक डेविड फिलो और जेरी येंग ने किया था. वे भी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे. उन्होंने सबसे पहले अप्रैल १९९४ में जो डायरेक्टरी शुरू की उसका नाम रखा था- जेरीस गाईड टू द वर्डवाईड वेब. अकेले इसी साल एक मिलियन से ज्यादा हिट्स आये. १८ जनवरी १९९५ को याहू नाम रजिस्टर हुआ और यहां से याहू डायरेक्टरी युक्त पोर्टल में बदल गया.

याहू के इस स्वरूप को निवेशकों ने हाथो-हाथ लिया और पैसा भी लगाया. जब याहू के सफलता का यह अध्याय शुरू हो रहा था तो उनके सामने सबड़े समस्या थी कि अगर कंपनी को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना है तो इसमें निवेशकों को विज्ञापन से होनेवाली आय का रास्ता दिखाना पड़ेगा. अब याहू के संस्थापकों के सामने बड़ी मुश्किल यह थी कि अगर वे अपनी वेबसाईट पर विज्ञापन देते हैं तो क्या इससे दर्शक आना बंद तो नहीं कर देंगे? लेकिन दूसरी ओर निवेशकों को अपनी पूंजी का रिटर्न भी चाहिए था. एक टीवी इंटरव्यू में जैरी यैंग ने माना था कि उन्होंने विज्ञापन लगाने का फैसला बहुत डरते हुए किया था. लेकिन विज्ञापन लगाने के बाद साईट पर आनेवाले लोगों ने कोई एतराज नहीं दिखाया. साईट पर आनेवालों की संख्या लगातार बढ़ती रही. बात बन गयी. उस समय निवेशकों ने यह महसूस किया कि इंटरनेट विज्ञापन का नया हथियार हो सकते हैं. अगर किसी एक जगह ढेर सारे लोग आते-जाते हों तो वहां विज्ञापन की अकूत संभावनाएं बन जाती हैं.

१९९७ आते-आते इंटरनेट इंटरनेट कमाई का बड़ा जरिया बन चुका था जिसमें सर्च की सुविधा देनेवाली कंपनियां सफलता का परचम लहरा रही थीं. इसमें याहू के अलावा लाईकास और एक्साईट जैसी कंपनियां भी थीं जो वेब पर डायरेक्टरी से आगे निकलकर सर्च की सुविधा मुहैया करा रही थीं. जिन दिनों यह सब हो रहा था उसी समय इसी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में दो छात्रों का संपर्क हुआ जो कि दोनों ही कंप्यूटर साईंस में पढ़ाई करने आये थे. यह १९९५ की बात है. लैरी पेज (२४) और सर्गेई ब्रिन (२३) मिले और उन्होंने भी इस बारे में काम करने के लिए बात की. जैसा कि गूगल वेबसाईट का कहना है दोनों में बात नहीं बनी लेकिन इन छात्रों ने आगे इस बारे में और बात करने और काम करने का निर्णय लिया. एक साल बाद इन छात्रों ने विश्वविद्यालय के ही सर्वर पर एक खोज इंजन का प्रयोग शुरू किया जिसका नाम रखा गया था ब्लैक रब. इस सर्च इंजन के कारण विश्वविद्यालय के बैंडविट्थ का खर्च इतना बढ़ गया था कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे बंद करने या यूनिवर्सिटी से बाहर ले जाने की सलाह दी.

१९९७ में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के ये दोनों छात्र सिलिकान वैली में आ गये जहां निवेशक डाटकाम के बूम में पैसा निवेश कर मोटी कमाई का इंतजाम कर रहे थे. अब तक सर्च इंजनों ने ईमेल और दूसरी ऐसी सेवाएं शुरू कर दी थी जो उपभोक्ता को नियमित आने के लिए बाध्य करती हों. आज गूगल को देखकर ऐसा लग सकता है कि जब उन्होंने gogool के जिस गणितिय सिद्धांत पर अपना सर्च इंजन विकसित किया था उसे हाथो-हाथ लिया गया होगा. लेकिन ऐसा नहीं था. लैरी और सर्गेई को सालभर धक्के खाने पड़े. इन्होंने जिस भी निवेशक को अपना विचार दिया सबने यही कहा कि अब एक और सर्च इंजन. पहले ही इतने सारे हैं जिससे लोगों का काम हो जाता है. लेकिन दोनों लड़कों ने हार नहीं मानी. हां, थोड़ा निराश जरूर हो रहे थे. इसी समय इन लड़कों ने सन माईक्रोसिस्टम के सह संस्थापक विनोद खोसला से मुलाकात की. विनोद खोसला तब सन माईक्रोसिस्टम छोड़कर निवेश बैंकर हो चुके थे और उन्होंने एक्साईट सर्च में पैसा लगा रखा था. उनको इन लड़कों का वह सिद्धांत पसंद आया जिसे इन्होंने गूगल नाम दिया था. उन्होंने तुरंत एक्साईट सर्च के एक पदाधिकारी ग्राहम स्पेंशर से इन लड़कों की एक रेस्तरां में मुलाकात करवाई. इन लड़कों ने अपने सर्च इंजन की खूबियों को बड़ी उम्मीद से बताया. उन्हें उम्मीद थी कि स्पेंशर प्रभावित होंगे तो एक्साईट कंपनी गूगल को खरीद लेगी. इसके लिए उन्होंने एक्साईट से १० लाख डालर की मांग की. एक्साईट के सीईओ ने इस सौदे से मना कर दिया जो आज मानते हैं कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल थी. जिस गूगल को एक्साईट ने इस समय १० लाख डालर में नहीं खरीदा आज उसकी बाजार में कीमत १०० अरब डालर है.

लगातार ना-ना सुनते हुए भी लैरी और सर्गेई लोगों से मिलते रहे और अपने सर्च इंजन के बारे में बताते रहे. अगस्त १९९८ में सन माईक्रोसिस्टम्स के ही सह संस्थापक एन्डी बैकोसिम पहली बार उनसे मिलने उनके घर गये. उन्होंने उन लड़कों को सुना और तुंरत एक लाख डालर का चेक काटकर दे दिया. काम शुरू हो गया. गूगल का अस्तित्व विचार से निकलकर धरातल पर आकार लेने लगा था. शुरू होने के छह महीने के भीतर ही गूगल का सर्च इंजन टाप १०० साईटों में शुमार हो गया. यह गूगल के भविष्य की सुनहरी झलक थी. असल में इस समय तक वेब-पोर्टल पर चमक-दमक इतनी बढ़ गयी थी कि इन पोर्टल ने सर्च पर ध्यान देना छोड़ दिया था. सर्च परिणामों में महत्वपूर्ण जानकारियों से ज्यादा कंपनियों और प्रायोजित सामानों के विज्ञापन ज्यादा आते थे. जिस एक विचार से पोर्टल को पहली बार नयी जान मिली थी उन्होंने उस विचार का ही लगभग परित्याग कर दिया था. ऐसे में गूगल का पूरी तरह से सर्च पर केन्द्रित होना उसके लिए बड़े फायदे का सौदा होनेवाला था. गूगल के वेबसर्च का मूल सिद्धांत उसका इनकमिंग लिंक काउण्ट है जिससे वे पेजरैंक का निर्धारण करके वेब में मौजूद सामग्री को पाठकों तक पहुंचाते हैं. हालांकि समय के साथ गूगल ने बहुत सारी नयी बातें जोड़ी हैं लेकिन पेजरैंक का उनका पुराना सिद्धांत अचूक है.

क्या यह सुनकर आश्चर्य नहीं होता कि जिस गूगल के पीछे आज पूरी दुनियी दीवानी है उसे अपने शुरूआती दिनों में कोई निवेशक नहीं मिल रहा था. विनोद खोसला चाहते थे कि गूगल को एक्साईट खरीद ले. उन लड़कों ने इसके लिए दस लाख डालर मांगे थे लेकिन एक्साईट ने यह कहते हुए मना कर दिया कि वे सर्च का यह काम बहुत बेहतर कर रहे हैं. फिर किसी को १० लाख डालर क्यों दें? आज वही गूगल १०० बिलियन डालर की कंपनी है.

कुछ शुरूआती अड़चनों और दिक्कतों के बाद गूगल ने कभी पीछे लौटकर नहीं देखा. फरवरी १९९९ तक वे अपने गैरेज से ही काम करते रहे लेकिन अब उन्होंने गैरेज से निकलकर अपना आफिस लिया और आठ लोगों को नौकरी पर रखा. इसके बाद लगातार गूगल की सफलताओं की कहानी सार्वजनिक है. यह गूगल ही है जिसके कारण डूब चुकी डाटकाम इंडस्ट्री को नया जीवन मिला. गूगल ने बहुत सारे ऐसे काम किये जिसके कारण वेब/इंटरनेट लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन सके और लोगों ने सिर्फ सूचना लेने के काम से आगे निकलकर सूचना प्रदान करने की भूमिका निभानी शुरू कर दी. अब भी एक मुश्किल थी कि जो निवेशक पैसा लगा रहे हैं उनको रिटर्न कैसे मिलेगा? लैरी और सर्गेई दोनों ही इस बात के पक्षधर थे कि बैनर एड उनके लिए भी उसी तरह बाधा हो सकते हैं जैसे दूसरे सर्च इंजनों के लिए हैं और वे किसी भी कीमत पर सर्च के काम को कमतर नहीं करना चाहते थे. इसी समय इनकी नजर आईडिया लैब के उस प्रयोग पर गयी जो वेब पर आनलाईन यैलो-पेजेज का प्रयोग कर रहे थे. यह बहुत उत्तम विचार था. इससे यूजर को बिना कोई दिक्कत पहुंचाए ज्यादा सटीक विज्ञापन दिखाया जा सकता है जो उसके काम का हो सकता है. गूगल ने इस रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया. जब आईडिया लैब को इस बारे में पता चला तो उसने अदालत में गूगल पर मुकदमा कर दिया. बहरहाल गूगल आईडिया लैब के बीच अदालत के बाहर समझौता हो गया और एक रकम देकर दोनों ने साथ काम करना स्वीकार कर लिया.

गूगल की सफलता इंटरनेट को नये मायने देने का दूसरा नाम है. गूगल न होता तो शायद आज इंटरनेट हमारे सामने इस रूप में नहीं होता. यह गूगल ही था जिसने सबसे पहले इसे बहुभासी बनाया और इस रास्ते में जितनी रूकावटें थीं उन्हें दूर किया. सर्च इंजनों में यूनिकोड का सबसे पहले प्रयोग गूगल ने ही किया जिसके कारण वेब दुनिया की अधिकांश भाषाओं का माध्यम बन गया. लेकिन जैसा अब तक इतिहास में होता आया है, वह गूगल के साथ भी होगा. इतिहास में हर विचार की एक उम्र निर्धारित होती है. समय बीतने के साथ नये विचार उनको पीछे छोड़ देते हैं. आज दस बाद जब गूगल एक वेबसाईट कंपनी से बहुत आगे निकलकर एक गणराज्य की शक्ल ले चुका है जो भविष्य की आभासीय दुनिया में बहुत निर्णायक भूमिका अदा करनेवाला है. इस गणराज्य के केवल आर्थिक ही नहीं सांस्कृितक और सामाजिक परिणाम भी होगें. अगर पूरी दुनिया की सूचनाएं और गतिविधियां किसी एक या दो पोर्टल के सुपर कंप्यूटरों में दर्ज होगीं तो निश्चित रूप से खतरे का अंदेशा रहता ही है. आज के गूगल के स्वरूप से उस खतरे का आभास होने लगा है. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि आखिरकार हर गणराज्य की एक सीमा होती है, और चक्रवर्ती सम्राट की एक उम्र. इसे एतिहासिक सत्य मानें तो गूगल के बारे में यह सीमा और उम्र क्या होगी? 

http://www.visfot.com/investigation/ten_year_of_google.html