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ग्रीनपीस द्वारा जारी एक ताजा सर्वे में यह खुलासा किया गया है कि ग्रीन हाउस गैसों को कम करने के लिए कम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक सामान बनानेवाली कंपनियां फिसड्डी साबित हो रही हैं
यह तीसरी बार है जब ग्रीनपीस इंडिया ने कंम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक सामान बनानेवाली कंपनियों की एक रैकिंग जारी की है. इस रैंकिग में सिर्फ सोनी और सोनी इरिक्शन को छोड़कर कोई भी भारतीय कंपनी 10 में से 5 अंकों को भी नहीं पा सकी है. ग्रीनपीस ने समग्र रूप से एक ऐसी पद्धति विकसित की है जिससे यह अंदाज लगाया जाता है कि किसी इलेक्र्ट्रानिक कंपनी द्वारा जो उत्पाद बनाये जा रहे हैं वे उर्जा संरक्षण में कितना योगदान दे रहे हैं, कंपनियां अपने उत्पादों में जो रासायनिक उपयोग कर रही हैं वे पर्यावरण को किस मात्रा में नुकसान पहुंचाती है और कंपनी द्वारा बनाये गये उत्पाद के अंत पर पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचता है.
ग्रीनपीस लगातार यह अभियान चला रहा है कि भारत में कम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक कंपनियां न केवल उर्जा संरक्षण करनेवाले उत्पाद बनाएं बल्कि खतरनाक और दुनिया के दूसरे हिस्सों में प्रतिबंधित केमिकल्स के प्रयोग पर भी रोक लगाएं. ग्रीनपीस की ओर से जो 15 मानदंड तैयार किये गये हैं उनमें तीसरी बार एचसीएल फिसड्डी कंपनी साबित हुई है. अपने उत्पादों को पीवीसी प्लास्टिक से मुक्त रखने, पुनर्शोधित प्लास्टिक का प्रयोग करने, ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने, परंपरागत उर्जा पर निर्भरता बढ़ाने और उत्पादों को कम उर्जा के खपत के लिए तैयार करने के मसले पर वह पूरी तरह से विफल रही है. लेकिन ऐसा नहीं है कि एसचीएल इस बारे में काम नहीं कर रहा है. रिपोर्ट कहती है कि जरूरी संरक्षा उपायों को लागू करने के लिए कंपनी पहल कर रही है. प्रतिबंधित रसायनों को अपने उत्पादों से अलग करने के लिए एसचीएल बहुत तेजी से जरूरी कदम उठा रहा है.
बदतर से बेहतरः पीसीएस (सबसे बदतर), निन्तेन्दो, जेनिथ(Zenith), माइक्रोसाफ्ट(Microsoft), विप्रो(Wipro), एलजी(LG), एसचीएल(HCL), एफसएससी, फिलिप्स(Philips), लेनोवो(Lenovo), शार्प(Sharp), एप्पल(Apple), एचपी(HP), मोटोरोला(Motorola), पैनासोनिक(Panasonic), एसर(Acer), तोसिबा (Toshiba), डेल(dell), सैंमसंग(Samsung), नोकिया(Nokia), सोनी(Sony), सोनी एरिक्शन (सबसे बेहतर)लेकिन इस रैंकिग में सबसे बुरी गत है पीसीएस की. पीसीएस देशी कम्प्युटर निर्माता कंपनी है और हर मानदण्ड पर पूरी तरह से फेल हुई है. पीसीएस के कम्प्यूटर और इलेक्ट्रानिक सामान निर्धारित 15 मानदण्डों में से किसी पर भी खरे नहीं उतरते. पीसीएस के कम्प्युटर न तो उर्जा की बचत करते हैं, न पीवीसी प्लास्टिक के उपयोग पर किसी प्रकार की रोक लगा रहे हैं और न ही आगे की उनकी कोई योजना ऐसी दिखाई देती है कि आनेवाले दिनों में कंपनी इस दिशा में कोई कदम उठायेगी. देश की एक दूसरी बड़ी कंम्प्यूटर निर्माता कंपनी जेनिथ कम्प्यूटर्स का भी यही हाल है. हालांकि जेनिथ कम्प्यूटर्स ने पीवीसी प्लास्टिक के उपयोग को बहुत तेजी से युक्तिसंगत और पर्यावरण के अनुकूल बनाया है लेकिन रसायनों के इस्तेमाल, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए जरूरी उपाय और उर्जा संरक्षण जैसे मुद्दों पर यह कंपनी अभी भी फिसड्डियों की ही श्रेणी में है. ग्रीनपीस रैंकिंग में यह कंपनी दस में से मात्र एक नंबर हासिल कर सकी है.
वैसे ग्रीनपीस के बनाये मानदण्डों पर विप्रो के कंम्प्यूटर भी खरे नहीं उतरे हैं. ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन, उर्जा संरक्षण, परंपरागत उर्जा के उपयोग और पीवीसी प्लास्टिक से उत्पादों को ज्यादा सुरक्षित बनाने के मसले पर विप्रो भी असफल साबित हुई है. हां कंपनी ने एक निर्णय जरूर किया है कि वह एक समय सीमा के भीतर अपने उत्पादों से पीवीसी के प्रयोग को बंद कर देगी. ग्रीनपीस के अभिषेक प्रताप बताते हैं कि सोनी इरिक्शन ही एक ऐसी कंपनी है जो लगभग हर कसौटी पर खरी उतरती हैं." अभिषेक प्रताप बताते हैं कि भारत में जितने बड़े बहुराष्ट्रीय ब्राण्ड हैं वे सब भारत आकर गैरजिम्मेदार व्यवहार करने लगते हैं. आज देश में इलेक्ट्रानिक उत्पाद बनानेवाली जितनी कंपनियां है उनमें से शायद ही कोई हो जो अपने उत्पाद को वापस लेकर उनके सुरक्षित निस्तारण की गारंटी लेती हों. अभिषेक कहते हैं कि दो बड़ी भारतीय कंम्प्यूटर निर्माता कंपनियों द्वारा इस तरह से पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के मुद्दे पर गैरजिम्मेदाराना व्यवहार दिखाना बहुत दुखद है.
क्या कहता है ग्रीनपीस (Greenpeace)
ग्रीनपीस के प्रचारक रमापति कुमार कहते हैं “हर उत्पादक को अपने सभी उत्पादों पर नजर रखनी होगी कि आखिरकार उसका अंत कैसे होता है. बिना इसके भारत में बढ़ते ई-कूड़े के संकट से निपटना बहुत मुश्किल होगा. वर्तमान में केवल 10 प्रतिशत इलेक्ट्रानिक उत्पाद ऐसे हैं जो वैध तरीके से निपटाये जाते हैं.” ज्ञात हो कि इस समय भारत में हर साल 3 लाख टन ई-कूड़ा पैदा होता है जो साल 2012 तक बढ़कर 10.6 लाख टन हो जायेगी.
यहां एक बात जानने लायक है कि उत्पाद के डिजाईन के दौरान ही अगर सावधानी बरती जाए तो ई-कूड़े के खतरे को बहुत कम किया जा सकता है. इसीलिए ग्रीनपीस लगातार “उत्पादक की जवाबदेही” तय करने के लिए अभियान चला रहा है. उत्पाद के डिजाईन स्तर पर ही उसे पर्यावरण अनुकूल बनाने का प्रयास करना चाहिए न कि तब जब उस उत्पाद को नष्ट किया जा रहा हो. ऐसे में उत्पादकों को जिम्मेदार बनाना ग्रीनपीस के अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है.
इस नजरिये से आप इलेक्ट्रानिक उत्पादन करनेवाली भारतीय कंपनियों को देखेंगे तो पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बनाने के अपने प्रयासों में वे अपनी समवर्ती विदेशी कंपनियों से बहुत पीछे नजर आते हैं. इससे जाहिर होता है कि भारतीय कंपनियां पर्यवारण अनुकूल उत्पाद बनाने में बहुत उत्साहित नहीं हैं. ऐसे में ग्रीनपीस की यह रैंकिग गाईड बड़े उत्पादकों के लिए एक चुनौती है कि एक समयसीमा के अंदर वे पर्यावरण अनुकूल उत्पादन को अपने यहां पूरी तरह से कैसे लागू करते हैं. यहां एक बात यह भी ध्यान में रखने की है कि भारतीय कंपनियों को समझना चाहिए कि ई-कूड़े की समस्या से तब तक नहीं निपटा जा सकता जब तक कि भारतीय कंपनियां पूरी तरह से बचाव की रणनीति पर काम नहीं करती. अभी भारतीय कंपनियों का ढर्रा है कि वे कूड़े को मैनेज करना चाहती है जबकि अच्छा रास्ता है कि उत्पाद को ही ज्यादा पर्यावरण अनुकूल बनाया जाए. उन केमिकल और रसायन को कम से कम उपयोग में लाया जाए जो मानवीय स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं.
इस बारे में भारतीय कंपनियों को जल्द ही वैश्विक नीति अपनानी होगी कि वे अपने उत्पाद को कितना पर्यावरण अनुकूल बना पाते हैं. यही भारत के पर्यावरण और व्यवसाय दोनों के हित में है. अगर विश्व बाजार में भारतीय कंपनियों को टिके रहना है तो अविलंब उन्हें इस रणनीति पर काम करना होगा.
http://www.visfot.com/paryavaran/266.html