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kautig aur daandalo
Posted On: 23/09/2008 03:53:21
कुछ दिन पैली देखी
एक कौतिग, नेहरू स्टेडियम की छोटी पाह्डियो पर पाह्डियो को,
ढोल दमौ , गीत प्रीत , मिठै सिठै,
सब्बि- सुणी,  करी, चाखी छै /
पर ह्वैगी छै बिसर्या जमाना की बात,
याद छा त नार्थ ब्लाक  अर गुलाबीबाग का बस स्टैड,
यस सर अर यूवर्स फेथ्फुल्ली का बीच,
पहाडी कख हरची ,
मेरा छैल तै बि पता नि लगी
कखी अन्ज्वाल (डन्ड्रियाल ) पढी
जग्वाल (पारू) देखी
अर्ध्ग्रामेश्वर (धस्माना) करी
पर बिज्ल्वाण नि मिली-
कौतिग मा मिन देखी
 बिकट दन्दालो
बरसों कि बिस्म्रती  को घास
स्यू जल्डो भैर आये
तब देखेणी पाअड
अफू से भैर आइक मिन देखी त हकाणै ग्यो मि,
येकुला चणा अर भड्भूजा का भाड कि कथा अबारे हि सच होणी थै
पहाड़ त सब दिल्ली ऐगे, फिर मे यकुलु वापस,
तबारे धरे कैन मेरा कान्ध ऐच हाथ,
यु मै हि थौ अप्णू सान्स अफ्वी बधौणू
पाड त फैल जालो  दुनिया मा
पाअड मा रै  नि रै पर जुडियु  रै  रे जल्डो से
मी आज भी जुड़यूँ छौ  पहाड़  से
  मेरा पहाड़  से ||


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