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Karanprayag
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एक सच्ची प्रेम-गाथा--
Posted On 11/08/2008 05:26:35

एक सच्ची प्रेम-गाथा--

आज पूरे पाँच दिन हो गए लेकिन राजू की कोई ख़बर नही. बेचारी राधा रास्ते के  पत्थर पैर बैठे-बैठे उसका इंतजार कर रही है हमेशा की तरह, लेकिन आज भी रास्ते पर नजर दौडाती है तो उसे सिर्फ़ दूर से उड़ता हुआ धुँवा और धुल उड़ती हुई नजर आती है,उसे फिर आज निराश घर वापस जाना होगा. वो बेचारी परेशान है की आख़िर बात क्या है , न कोई ख़बर न कोई पता आख़िर राजू गया पर गया कहाँ. उसके दिमाग में बुरे से बुरे ख्याल आने लगे हैं, क्या वह मुझे धोखा दे गया? उसे कोई दूसरी लड़की पसंद आ गई? नही !! नही!! मेरा राजू एसा नही है वह मुझे बहुत प्रेम करता है वह कभी एसा नही करेगा !!! जरुर उसकी कोई मज़बूरी होगी तभी तो वह मुझसे नही मिल पा रहा है. ऐसे ही न जाने कितनी विचारों को वो पगली अपनी आगोश में लेकर नींद की  गहराइयों में चली जाती है. दिन युही गुजरते गए न राजू आया न राजू की कोई ख़बर. राधा मानो सिर्फ़ एक जिन्दा लाश बन चुकी थी. एक दिन राधा क घर में अचानक लगी आग ने सब कुछ जला कर राख कर दिया. घर की सभी चींजे आग की भेंट चढ़ चुकी थी , अंदर फंसी राधा का दम हवा की कमी से घुट रहा था, साँस लेने की लिए हवा कम पड़ रही थी, राधा को लग रहा था की मौत कभी भी उअसेय अपने आगोश में ले सकती है, की तभी अचानक घर की छत से पानी की बूंदे राधा के माथे पर गिरने लगी , अब राधा को साँस लेने में भी कोई दिक्कत भी नही हो रही थी, अचानक भड़की आग भी अब शांत हो चुकी थी ,राधा घर क बहार निकली तो देखा तो बहार लोग खडे हैं लेकिन कोई भी पानी नही फेंक रहा था, सब हैरान थे की आखिर पानी की बूंदे कहा से आई और आग अचानक कैसे बुझ गई, राधा भी हैरान थी, खैर लोगो ने कहा जान बची तो लाखों पाए.राधा तो बच गई.
आज पूरे  एक हफ्ते हो गये इस बात को, राधा आज भी रास्ते के उस पत्थर पर बैठे निराश नजरों से उस उडते हुए धुंए और धुल को की अचानक उसे अपनी आंखों पर जैसे विश्वास ही नही हुआ राजू मुस्कराता हुआ उसकी तरफ़ आ रहा था और जैसे ही वह राधा के नजदीक पंहुचा राधा अपनी आंसुओं को रोक नही पायी और फूट-फूट के रोने लगी.राजू चुपचाप उसे रोता देखता रहा और तब तक देखता रहा जब तक की उसका मन हल्का नही हो गया . राधा न पूछा इतनी दिनों बाद मिले हो , कहा चले गए थे में तुम्हारे इन्तजार में पागल हो गई हु , और ना जाने कितनी सारे प्रश्नों का अम्बर लगा दिया राधा ने राजू का सामने,राजू चुपचाप सुनता रहा और जब राधा चुप हो गई तो राजू बोला " राधा तुम जानती हो उस दिन तुम्हारे माथे पर पानी की बूंदे किसने डाली थी , मेने ही  डाली थी वो आग भी मेने ही बुझाई थी" तुम्हारे माथे पर मेरे आंसू बूंदों के रूप में गिरे थे" लेकिन तुम तो वह कही थे ही नही!!! तो फिर तुमने वो आग कैसे बुझाई !!! यह सुनकर राजू की आंखों से आंसू की चंद बूंदे राधा के चेहरे पर गिर गई !! राधा को मानो दुनिया भर की खुशी मिल गई हो लेकिन साथ-साथ दुःख इस बात का की आखिर राजू रो क्यों रहा है, येही सोच-के जब राधा ने अपनी आँखे खोली तो राजू थोडी ही दूर पर खड़ा होकर उस से कहने लगा " राधा मुझे माफ़ करना में तुम्हेर साथ नही निभा सका में मर चुका हु राधा ,मेरे इस मिटने वाले शरीर ने मेरा साथ छोड़ दिया है ,मुझे मारे हुए २० दिन हो गए है. यह सुन राधा को मानो सौंप काट गया हो उसके आंखों के आगे अँधेरा छ गया ,जब तक वो होश में आती राजू रास्ते में उड़ने वाले उस धुंए के साथ सदा के लिए राधा की आंखों से दूर चला गया था ......और राधा उस धुंए से बने हुए संसेश को पड़ रही थी " में हमेशा तुम्हारे चारों तरफ़ हु राधा , फर्क इतना है की मेरा ये शरीर नही है" लेकिन राधो को तो मानो इस संदेश का अर्थ ही नही मालुम.... वो तो बस अपलक उस धुंए को देखती रही...... अगेले दिन .......गाँव वाले राधा को शमशान ले जाते हुए एक ही बात का जिक्र कर रहे थे की- सची प्रेम गाथा शायद इसी को कहते है.

Tags: एक सच्ची प्रेम-गाथा--


HENSI NA
Posted On 23/07/2008 04:09:15

लड़का (लड़की से): जानेमन.ये  दिल भितर एजा न!

लड़की (लड़का से): सैडल निकालु क्या?

लड़का : पगली, यु  मंदिर नि चा ..इनी के एजा.


त्यारू कर्ज.................
Posted On 23/07/2008 03:03:29

त्यारू कर्ज.................
इ कविता म एक आदमी की दुखी आत्मा (जू की अब मर ग्यों) अपरी माँ थे बोलणी छ की हे माँ.........................

"त्यारू लाड्लू छू माँ,त्यारू दुलारू छू माँ.
त्यारू आंखों कु तारु छू ,त्यारू एक सहारू छू माँ.
तिन मि पाली पोसी,दुलार करी माँ.
पर म्यारा मन म एक बोझ छ माँ. मि मरी नि, मि मारेग्ये छौं माँ.
दोस्तोन धोखा दिनी , पिछिन बटी छुरा मारी माँ.
पैसों का खातिर तौन या योजना बनाई माँ.
त्यारू लाड्लू छू माँ,त्यारू दुलारू छू माँ.
त्यारू आंखों कु तारु छू ,त्यारू एक सहारू छू माँ.
मेते यांकी चिंता नि,चिंता छ ता त्यारी माँ.
की कु खवोलू, कु देखुलू,कु च अब त्यारू सहारू माँ.
मि त्यारा चारों तरफ़ रोलु, तू मयारू एहसास करी माँ.
त्यारू लाड्लू छू माँ,त्यारू दुलारू छू माँ.
त्यारू आंखों कु तारु छू ,त्यारू एक सहारू छू माँ.
मजबूर छू मि,रूप नि ले सकदु क्वी और, या विधाता कु लेख च माँ.
तू म्यारा न होण पर रोई न,अर न करी चिंता क्वै.
मि बौडी की आलू अगला जनम म, लेकर एक इच्छा
की सभी जनम म तू ही मेरी माँ बड़ी, मोक्ष कु जाणु छू माँ.
त्यारू लाड्लू छू माँ,त्यारू दुलारू छू माँ.
त्यारू आंखों कु तारु छू ,त्यारू एक सहारू छू माँ.
Created by Laxman Negi

 

Tags: त्यारू कर्ज


मेरी माँ......................
Posted On 22/07/2008 07:39:59

मेरी माँ......................
म्यारा भैजी-भुलों इन चंद अक्षरों का दगड़ मि अपरी उन् जनम देण वाल्यी माँ ते प्रणाम करुनू छू. मेरी आप सभी से यही प्रार्थना च की अपरी उन् जनम देण वाल्यी माँ ते कभी भी रुलाई न. क्योंकि भैजी या वी छ जेन पता नही कदगा दुःख सहन करना बाद तुमो ते जनम देनी.

" मौघ व्हाई या ज्योठ कु महिना,माँ जी तिन कदगा दुःख सहिना.
मै थे जनम देण कु खातिर माँ जी,तिन कन-कन दिन नि देखिना.
बेमन खाई माजी तिन ऊ खाणु, जों ते बीमारय आदमी खादिना.
ऊ घड़ी बी आई जे दिन तुमन मै थे जनम दियानी.मि रुँणु छऊ माजी पर तिन उफ तक नि करिनी.
त्यारा आंखों म मेरी जनम की खुशी छ माजी,तू सारा दुःख दर्द भूल गेनी.
लेकिन तू अभागी छे माजी, जे का बाना तू खुश व्होणी च क्या वैन कसम खयाली.
कि मि अपरी माँ कु सदा ख्याल रखुलू,वी का आंसू पोछुलू.
लेकिन हे माँ ते तें ये बात कि भी चिंता नि,तू ता मयारू मुख देख क ही खुश च.
माजी तें मि ते पढाई-लिखाई,समाज म जगह दिलायी.सिर्फ़ ये वास्ता कि मि त्यारू लाड्लू छ.
एक दिन वू दिन बी आई , म्यारी दुनिया म एक सौं-जडया आई.
वी का प्यार म इदिगा डूबी ग्यों,कि मिन अपरी माँ भुलाई.
रोणी छे माजी मेरी, दिन्देरी म बैठी देखणी छे बाटू मेरु.
पर वीं ते नि मालुम कि,स्वैना कभी बी सच नि होंदा
जे का बाना व बैठी च, वू वी ते छोड़ क दूर कखी चली ग्यायी.
दुनिया का एशो-आराम म पदयुं च, न ख़बर कई कि,न कई कि याद आई.
आज रौन्णु छऊ अपरी घड़ी थे,सारी दुनियान्न जब साथ छ्वाड्डी
कर्णों ते जब ध्यान से लगे,ता सिर्फ़ म्यारी माँ कि आवाज़ आई.
कि बेटा एजा मि त्यारी माँ छौं,त्यारा वास्ता मिन भुम्याव पुज्यायी.
छोड़ी मिन दुनिया का प्रपंच,मांजी मु बौडी कि आई,
मयारू आंखों का आंसू रुकना नि छ,सोचुणु च कि मिन क्या पाप कर्याली.
जिन मांजी मै ते जनम दिनी , मिन वही रुलाई.
हे !! चारों दिशाओं माफ़ क्र दे मै थें,और उन्थेय जिनोन अपरी माँ रुलाई.
सदबुधी दे सब्कुनि,और हमारी ये पुजनायी माँ थे अमर बनाई.
Created by Laxman Negi

Tags: मेरी माँ


मेरी सौं-जड्या
Posted On 22/07/2008 05:57:43

कन व्हली वा......................

इक लड़का थे वैका घौर्वावन इक नैनी खुज्याई . अब वी लड़कौ का मन का उबाव सुना आप सब लोग.

"मन इक हौड फर्कि, सुणि जब वी का बारा म.
मन पंख लगी उडी गे, सोचुणु च कन व्हली वा.
आंखां सुपन्याई व्ही गनी,और मन का उबाव उठ्णु च.
रात-दिन सपना छ विंका, की कन व्हली वा.
इनी व्हली या उनी व्हली, जाणि केन की कन व्हली वा.
मेरा मन का दरबार म, विंकू सभा बेठी च.
सब समझांदा में थे, पर मन पुछ्दु की कन व्हली वा.
गल्वादी होली बुरांश जन,होंठ होला गुलाब जन.
और केश होला जन सौणा मेना की हवा.
पर फिर ज्यू बुना च, कन व्हली वा.
कमर हिल्कांदी इन जन की छलांग लगौन्दी हिरण.
बच्यान्दी इन की रस घुल जांदू कनुर्यों म.
मन पंख लगी उडी गे, सोचुणु च कन व्हली वा.
छ्वाडा दिदो और भुलों, अब जन  भी व्हली वा
मेरी सौं-जड्या व्हाली वा"
Created by Laxman Negi

 

Tags: NAYU-NAYU BYO


GHASYARI KA GEET
Posted On 15/07/2008 07:41:31

इ कविता म एक घस्यारी अपरा स्वामी ते बुलौन छ. वीं की पीड़ा ये कविता कु माध्यम से आप सब लोंगो थे सुनाणु च.

"म्यारा स्वामी  तुम छेन परदेश म, म्यि यख ची अकेलु घौर म,
रात-दिन तुमारी याद औंदी,एक टीस सी उठदी जिकुड़ी म.
नौनी-नौन्याव का दगडी,धाण करण पुन्गुदयों म.
सासु जी की आन्ख्यों म बादल पड़ी गे,पागल हुया छ याद म.
म्यारा स्वामी  तुम छेन परदेश म, म्यि यख ची अकेलु घौर म
तुमारी ख़ुद म मेन सारी उमर बित्याली,अब ता लौट अवा घौर म.
यु ज्वानी अब नि लौतली, बुढापा धरयों च ध्हार म.
ज्यूँ करदू की उडी के तुमारा पास एजो, पर लोक-लाज भी च समाज म.
म्यारा स्वामी  तुम छेन परदेश म, म्यि यख ची अकेलु घौर म
घौर बुडा सिपाहियों देखि,आंसू औंदेन आन्ख्यों म.
नौनी -नौन्याव पुछेन छां, की हे माँ हमारा बाबा जी कख छान.
औंथे एक ही जबाब मिलदु,की बेटा तुमारा बाबा छां लाम (बॉर्डर) म.
म्यारा गीतों म भी अब मिठास नि रे गाये,वू बी दूर ख्वे जांदा बौन म.
घस्येरी सब घौर चली गाई, में एकुली च बौन म.
म्यारा स्वामी  तुम छेन परदेश म, म्यि यख ची अकेलु घौर म
Created by Laxman Negi

Tags: KHUDED


MYARU MULUK (GARHWAL)
Posted On 15/07/2008 04:05:17

मयारू मुलुक (मयारू गढ़वाल)
सोची की बड़ी हैरानी और परेशानी  हौन्दि छ,मयारू गढ़वाल  कख  लुकी  गे , एक  दिन  की  बात  छ  मी आप्रू  घौर का  चौक  का  किनारा  बाटिक  अपनों  गौं का  उन  सीदिनुमा  पुन्ग्दा (खेत ) कु  देखुनो  छू  जू  की  अब  बंजर  व्हागी. सोच्दु  छो  की  उबी  इंसान  रही  व्हाला  जाऊँ  इ  पुन्ग्दा  बडाई  व्हाला  इतगा  मेहनत करना  का  बाद  और  आज  हम  दुनिया  की  चमक -धमक  का  खातिर  सब  छ   छ्वादना. गौं  की  एडी -आछरी  भी  आंसू  छान  बौगना  की  यु  मनखी  जू  कभी  मी  ते  पूज्दु  छ  आज  मी  ते  छोडेगे  चली. कख  चली  वैट  भी ख़ुद नि  मालुम.देवतों  का  मन्दिर  का  अगाडी-पिछाडी  घास  च  जमी.न  क्वै उन  मन्दिर  को  देख  भाल  कर्णु  कु  और  न  ही  क्वै  च  पूजा  कर्णौ  कु. दूर  ध्हार  माँ  लातु  देवता  कु  ठान  भी  बंजर  वही  गे. उबी  अपर  वक्त  कु  रोनू  छ.  मेरा  घौर  समनी  वाला  देव  सिंह चाचा कु  माकन  अब  बिकुल  खाली  व्हा गई  न  जाने  कख  गई  उनका  नौनी -नौन्याव. उ  माकन  भी  गुजरी  वक्त  की  कहानी  बताणु  छ.दोस्तों  हम सब  अपरा घर  बाटिक  बहुत  दूर  छ  जाया  ये  रोजी -रोटी  कु  तलाश  म लेकिन  हमारा  कुल -देवतन  हमते  कभी   नि  बोली  छ  की  तुम  म -ते  भूल  जाया  अपरी  संस्कृति  ते  भूल  जे. अपरा  घौर  ते  भूल  जाया  जख  तुमन  अपरी  जिन्दगी  कु  सुरुआत  कनु  ते  अपरा  आंखी खुलीं  अपनी  जनम देन  वाई  माँ  ते  माँ  बोलीं , जय  घौर  का  आँगन  माँ तुमुं  खेली  करी , वे  ही  ते  तुम  छ्वान  चना  छ . उओ  दिन  भूल  गे  जब  सब  दोस्तों  दगड  तुम  दूर  बौन माँ  ग्वैरों  दगड  जांदा  छ  और  बौन  माँ  ही  खिचडी  पकुंदा  छ  और  सब  दोस्त  मिल  का  खांदा छ. न  जावा  ये  घर  बार  छोड़  की -न  जावा  ये  मुलुक  छोड़ी  की , उ  दिन  दूर  नि  जब  क्वै  तिस्रो  यख  एकी  अपरो  राज  कर  देलु  और  तुमन  तब  देख्दु  रे  जान , ये  मुलुक  वास्ता  लौट - जा , लौट  जा  ये  एडी  आछरी  का  वास्ता , लौट  जा  वी  लातु  देवता  का  वास्ता  --लौट  जा  वी  घौर का  वास्ता  जख  बातिन  तिन  अपरी  जिन्दगी  सुरु कर  छाई  . लौट  जा   वी  प्राईमरी  स्कूल  का   वास्ता  जख  तू  बोल्ख्या -पाटी  ले  कर  पड़ना  कु  जांदू  छ , एजा  बौडी  की  एजा ..............म्यार  आंसू  नि  छन  थामना  एजा --------------एजा --------------एजा -----------................

मी  इन्तजार  करना  छ  बेटा --------------------------------..... त्यारू अभागु  गढ़वाल .



HAMARI PARAMPARA
Posted On 15/07/2008 01:34:51
आज वक्त एगे,सोच्णु कु की क्या च हमारी परम्परा.
विकास का ये दौड़ म कख एगे हम, याद दिलानी च हमारी परम्परा.
लड़कुँ का कान म कुंडल,खुट्यों म फटीं जींस,और गर्व होणु च की ये च हमारी परम्परा.
नौन्यों का तन म बेशर्मी कु लिबास, देख के रोणी च हमारी परम्परा.
फैशन की ये दुनिया म, माँ -बबा बुलौन शर्म लगनी च, शर्मशार ह्वैगे परम्परा.
नाक पर माखा नि बठैन देन, भूल गया हम हौव लगौन की च हमारी परम्परा.
पुन्गन्यों म बबा थे रोटी-प्याज ल्याण की च हमारी परम्परा.
हौव बटिक घौर एके ज्होल्वी भात खाने की च हमारी परम्परा.
आज वक्त एगे,सोच्णु कु की क्या च हमारी परम्परा.
बड़ा बुजुर्गों कु खुटा छुनो की च हमारी परम्परा.
लेकिन ये सब कुछ भूल के हम लोग बुना छ की "क्या होती है ये परम्परा"
एक दिन येन आलू की खोज्दा राला हम की कख च हमारी परम्परा.
आज वक्त एगे,सोच्णु कु की क्या च हमारी परम्परा.
Created by Laxman Negi

Tags: SANSKRITI


TAARIF
Posted On 14/07/2008 08:17:49
त्यारा वास्ता मी , चाँद-तारा तोड़ दयूं.
त्यारा वास्ता मी. सूरज को बाटू मोड़ दयूं
त्यारा वास्ता मी, आसमान कु, रुख मोड़ दयूं
और जब तू हसदी छाई,तो ज्यु करदू की त्यारा सारा दांत तोड़ दयूं.



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