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Subhash Kandpal
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Male 24 years old Delhi India Profile Views: 3602
   [ 424 ]
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| DISTRICT IN UTTARAKHAND: |
Rudraprayad |
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07/09/2008 10:00:32 |
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Traveling,Listening to old hindi music,reading magazines,watching movie & TV news channels,taking part in social activities
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Munna Bhai MBBS, Lage Raho Munna Bhai, Babul, Bhagwan
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Pahari/Garhwali/Kumaoun, Old hindi songs
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मैं सुभाष काण्डपाल (Subhash Kandpal), उत्तराखंड राज्य के रुद्रप्रयाग जिल्ले के एक बहुत खूबसूरत गाँव बैंजी कांडई (Bainji Kandai) का रहने वाला हूँ. अगर कोई मुझसे पूछे कि तुम्हारी सबसे पसंदीदा जगह कोन सी है, तो मैं बस यही कहूँगा कि वो मेरा गाँव है. मेरा गाँव ही मेरा स्वर्ग है. अपने लोगों से बात करने, उनसे जान पहिचान बढाने, सुख-दुःख बाटने में एक अजीब सी सुकून की अनुभूति होती है, इसलिए इस साईट पर आप लोगों के बीच में आया हूँ. आशा करता हूँ कि आप लोगों को भी मेरा साथ पसंद आएगा, हम सभी लोग एक दूसरे के सुख-दुःख में हाथ बटायेंगे, एक दूसरे की भावनाओं को समझेंगे, उनकी क़द्र करेंगे और मोज मस्ती के साथ साथ कुछ अच्छा कार्य भी करेंगे जो कि हम सभी के लिए और हमारी आने वाली पीड़ी के लिए हितकर होगा.
जय भारत जय उत्तराखंड
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कुछ हम भी अर्ज करते हैं
मेरे प्यार की वो हद पूछते है
दिल में कितनी जगह है,ये पूछते है,
चाहते है हम सिर्फ़ उन्ही को क्यो इतना
उसकी भी वो हमसे वजह पूछते है!
जिंदगी में सदा हंसते रहो
हंसना जिंदगी की जरूरत है
जिंदगी को जियो इस अंदाज में
कि देख तुझे सब कहें जिंदगी कितनी खूबसूरत है
तमन्ना है उन्हें सिर्फ एक बार मिलने की
और कोई ख्वाहिश नहीं इस दीवाने की
शिकवा उनसे नहीं खुदा से है
क्या जरूरत थी उनको इतना प्यारा बनाने कि
कु्छ लम्हे कुछ एहसास मिटाये नही जाते
कुछ मीठी यादों के पल भुलाये नही जाते
कुछ नजरें ही खुद कह जाती हैं
हर अलफाज़ सुनाये नही जाते
गुजरे हुए कल की याद आती है
कुछ लम्हों से आंखे भर आती हैं
वो सुबह रंगीन वो शाम निराली जाती है
जब आप जैसे दोस्तों की याद आती है
रुकवा देना जनाजा जब उनका घर आये
शायद वो झांक लें खिड़की से और मेरा दिल धड़क जाये....
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ये पंकित्यां उतराखंड से तो सम्बनिधत तो नही हैं, ये मेरे मन के भाव हैं, जो मैं इस कविता के माधयम से ब्य्क्त्त करना चाहता हूं.
हाथ जोड़ीक करले पूजा,
मुंड झुके दे आज तू
कुछ नि होलु ए मनखी,
छोड़ी दे घमंड तू II
यखी तेरी माया रोली,
धन सगुणी पुंगणी हे
मुटठी बोटीक आयी इख,
हाथ पसारी जोलु हे II
ना बडू यख ना छोटु कोई,
देह सब समान च
धर्म सबका अपना अपना,
खून सबको लाल च II
पंच तत्त्वौं की काया तेरी,
ना कर अभिमान तू
इक भी त्त्वैते छोड़ी दयोली,
ह्व्वे जालु हे खाक तू II
भूखे की भूख मिटे दे,
प्यासे की प्यास तू
दुखियारौं को दुख मिटे दे,
कमैं ले इ पुन्या तू II
ना कर तू ईश्या द्वेष,
वाणी को हराश तू
चार घड़ी की सांस तेरी,
बांट ले खुशियां तू II
इस कविता में पूजा का मतलब भगवान की पूजा करने से नही है, ब्लकि उन कर्मौ को करने से है, जो भगवान को प्रिय लगते है.
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पर पीड़ा से छलक उठे मन, यह छलकन ही गंगा जल है
दुख हरने को पुलक उठे मन, यह पुल्कन ही तुलसीदल है
कार्य उद्यम से सिद्ध होते है, मनोरथो से नही।
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