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स्पैम मेल: सुनहरे सपनों का...
Posted On 05/02/2008 23:29:17

देहरादून। 'हमने इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों का रेंडम सर्वे किया है। इस सर्वे में आप हमारे लकी विजेता चुने गए हैं। आपने जीते हैं पचास हजार डालर यह रकम आपके एकाउंट में भेजी जाएगी, इसके लिए आपको अपना एकाउंट नंबर और कुछ सौ डालर इस पते पर भेजने हैं'। इस तरह के मेल आजकल अधिकांश इंटरनेट यूजर्स के इनबाक्स में देखे जा सकते हैं। अगर आपके इनबाक्स में इस ऐसी मेल आए तो सावधान हो जाइए। कोई आपकी खून पसीने की कमाई पर डाका डालने की तैयारी कर रहा है। इस प्रकार के मेल के फेर में पड़ कर सैकड़ों लोगों अब तक लाखों रुपए गंवा चुके हैं।

 

इनरनेट जहां जानकारियों का भंडार है, वहीं इससे कई लोगों के व्यवसाय भी जुड़े हैं। इंटरनेट पर आनलाइन गेंबलिंग, शेयर मार्केटिंग और लाटरी भी खेली जाती है। कुछ लोगों ने इंटरनेट को कमाई का आसान जरिया बना लिया है। इस खेल में कई बड़े ठग आ गए हैं जो भोले भाले लोगों को बेवकूफ बनाकर चूना लगा रहे हैं। ये लोग हमेशा नई चीजों को आधार बनाकर यह फर्जी मेल भेजते हैं। इनमें कभी लाटरी विजेता बनने का जिक्र किया जाता है तो कभी व‌र्ल्ड टूर के टिकट का। इस समय फुटबाल व‌र्ल्ड कप की फ्री टिकट जीतने की बधाई देने वाली स्पैम मेल भेजी जा रही हैं। इस प्रकार की मेल में विजेताओं को एक ई-मेल आईडी और किसी विदेशी शहर का जिक्र किया जाता है। इसमें इन विजेताओं से मेल में दिए गए पते पर संपर्क करने को कहा जाता है। एक बार जब विजेता बनने का हसीन ख्वाब सजाए लोग उक्त मेल पर जवाब भेजते हैं तो उनसे इसकी एवज में कुछ डालर मांगे जाते हैं। लाखों रुपए के लालच में लोग खुशी-खुशी रकम भेज देते हैं। इसके बाद इन लोगों के पास दुबारा कभी भी ई-मेल नहीं आती। तब जाकर इनको अपने लुटने का अहसास होता है। हाल ही में सीपीआई को इसी प्रकार की मेल भेजी गई। मेल में उन्हें ग्लोबल वार्मिग में भाग लेने के लिए आमंत्रण भेजा गया। मेल में दो लोगों के लिए आने जाने के लिए मुफ्त हवाई टिकट देने की बात कही गई थी। ठहरने के लिए इनसे कुछ पाउंड जमा करने को कहा गया। इसके चलते सीपीआई ने लगभग चालीस हजार रुपए भेजे। बाद में जब सीपीआई ने उक्त पते की जांच की तो वह गलत निकला। यह तो एक उदाहरण मात्र है। इस प्रकार के फर्जी मेल रोजाना हजारों लोगों को चूना लगा रहे हैं।


नया साल मुबारक हो
Posted On 30/12/2007 23:52:58

आप सभी लोगों को नए वर्ष की हार्दिक शुभ कामनाएं

 


Free Heart check-up camp at Bhikyasen,Uttarakhand
Posted On 27/12/2007 03:40:56

Dear Friends,


It is our pleasure that Ist time Young Uttarakhand Group
creating history to Organizing
a free medical check-up camp in uttarakhand with the help of
top Heart specialists Doctors of Escorts Heart Institute New Delhi along with
their team and the honorable MLA Mr. Surendra singh Jeena (Bhikyashain Almora
Uttarakhand)
.




Date : 12th & 13th January'2008


Time :
10:00am to 4:00 pm

Place: Govt. Hospital, Bhikyasain, Almora
Uttarakhand

 


We need support from all members by "TAN MAN &
DHAN",



The group had to bear expenses such as traveling charges of the
volunteers, Food and living arrangements for the Doctors and their Team.
Additional expenditures are related to advertising of the event on large scale
in Bhikiyasen.

 



I therefore, request all the members to come forward and
contribute for this noble cause. You can send the payment by cheque or cash. The
Account Payee Cheque should be in Favor of 'Young Uttarakhand' and you can send
it to 232, Subhash Khand, Giri Nagar, Kalkaji, New Delhi - 110019, India or you
can electronically transfer the same to the ICICI bank account No.
022401002313.



Thanks & Regards


Team Young Uttarakhand.




For any
Inquires
Plz Cont to Vivek Patwal
@ 9811511501

 

 

 


Plz Vote 4 Vasu
Posted On 22/12/2007 02:27:32

Pls watch and vote for Vasundhara at Zee TV's SaReGaMa Lil' Champ
tonight (Friday) and tomorrow (Saturday) at
10:00PM.


 


Voting
Information:


 


SMS- type VASU and send to 57575


MTNL subscribers pls dial
1862424757507


Reliance subscribers pls dial
51234987


 


Vote before Monday 10
AM.


 


U can vote to Vasundhara Raturi thru
internet, pls creat ur id and vote to
her


 


http://www.lilchamps.zeetv.com/registration.php


Vasundhara Raturi- A little Champ in Zee TV Saa Re Gaa Ma Pa
Posted On 08/12/2007 02:03:21

Dont
miss to watch Sa Re Ga Ma
Pa little champ.....  Today at
10.00pm on Zee-TV

 


 


Dear
Friends,


 

 


A little and very beautiful kid
named "Vasundhara Raturi" is
performing in Sare Gama Pa little champ talent hunt show in Zee TV. She has a
very beautiful and melodious voice. Her performances have been very good in the
show so far, she has been getting good compliments from the
judges.


 


She is basically
belongs from Tehri Garhwal Uttarakhand. Her village name is Sirain, Patti Juwa,
Disst Tehri Garhwal. Her father name is Mr Anil Raturi who is working in
Ministry of External Affairs
.


 


She is a very special kid for us.
Her father told us something about herself.


 


"Vasundhara is a
Student of grade IV in DPS Vasant Kunj. She does her study in Braille and gets
support from National Association for the Blind, R.k.Puram, New Delhi. She is very good
in study. She was born in Lebanon when I was posted over there.
Then we shifted to New York USA and came to Delhi in January 2006. She has given
performances in all over USA from East coast to West coast.
She is well known as "Sonal" in USA. We came to know about her
singing talent when she was 2 yrs old. While staying in USA she learned
pahaadi from her Dadi and now is fluent in speaking pahaadi. I will make sure
that when she reaches voting round she will make voting appeal in her own
language. I need your cooperation for that. If you need more information about
her please let me know. My mobile number is 9968280226."
Said Anil Raturi (Her
Father)


 


 


The
show is being telecast At Zee TV on every Friday & Saturday at 10
Pm
. Dear friends she is a very good
and versatile singer. Public voting will be start from today's episode. I would
personal request all the members to keep on watching her performances in Zee TV
sa re ga ma pa little champs 2007 and keep your voting support with her. I am
not convincing you people because she is from Uttarakhand but because of along
with she has also a very very sweet voice and she deserves
it.


 


You can find more information about
her here: http://www.lilchamps.zeetv.com/participants.php?partid=3


 


 


I love Vasundhara's voice and i am
sure she will become a good singer one day.


 


My best wishes and support always
with you Vasundhara.


 


Thanks &
Regards


Subhash
Kandpal


श्रोताओं पर छाया नेगी की...
Posted On 23/11/2007 01:13:42

गोपेश्वर (चमोली)। तीन दिवसीय गढ़वाल महोत्सव की पहली सांस्कृतिक
संध्या सुप्रसिद्ध लोक गायक नरेन्द्र सिंह नेगी के नाम रही। गीत एवं नाट्य
प्रभाग नैनीताल के कार्यक्रमों ने भी आयोजन के उद्देश्य सफल करने में अमिट
छाप छोड़ी।

 

 


चमोली जनपद के गौचर क्षेत्र में इन दिनों गढ़वाल महोत्सव की धूम मची
है। गढ़वाल महोत्सव का उद्घाटन करते हुए राज्य के पेयजल एवं सिंचाई मंत्री
मातवर सिंह कण्डारी ने इन आयोजनों के पीछे गढ़वाल की संस्कृति, पौराणिक
रीति-रिवाज तथा विरासत संजोए रखने का आह्वान किया था। पहले दिन देर सायं
तक गीत एवं नाट्य प्रभाग नैनीताल द्वारा कई कार्यक्रम पेश किए गये। लोक
नृत्य..बसंत की हवा छ या पर कलाकारों ने प्रदर्शन मनमोहक रहा। प्रभाग के
ही कलाकार तथा गढ़वाल के पुराने लोक गायकों में शुमार वाचस्पति ड्यूढ़ी ने
...उड़ांदू भौंरा तौं ऊंची डांडियों मां, जैसा खुदेड़ गीत से दर्शकों में
छाप छोड़ी। डांडियां नृत्य के अलावा कार्यक्रम के संचालन कर्ता अनिल
घिल्डियाल ने भी कार्यक्रमों द्वारा गढ़वाल के वर्तमान परिदृश्य को नजदीक
से दिखाया। रात्रि समय गढ़ गौरव कहे जाने वाले तथा गढ़वाली लोक गीतों के
प्रसिद्ध गायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने जब मंच पर प्रस्तुतियां देनी शुरू की
तो उनकी आवाज का जादू श्रोताओं पर छा गया। नरेन्द्र सिंह नेगी ने जै अम्बे
दुर्गा भवानी स्तुति के साथ अपने मौलिक, पारंपरिक, खुदेड़ तथा सामाजिक
परिदृश्यों पर तैयार गीतों की झड़ी लगाई। इनमें ..ठण्डों रे ठण्डों मेरो
पहाड़ की हवा ठंडी, ..एै जांदी भगानी, ..भलू लगदू भनुली तेरू मठू-मठू
हिटणू, ..लस्का-ढस्का मां चली, ..अब खा माछा जैसे कई गीतों की लम्बी
श्रृंखला शामिल थी। उनके साथ कई गीतों में जहां प्रसिद्ध गायिका मीना राणा
ने साथ दिया, वहीं मीना ने कई एकल गीतों से दर्शकों का दिल भी जीता।
पांडाल में झूमते-नाचते दर्शकों ने गढ़वाली फिल्मों के निर्देशक अनिल
बिष्ट द्वारा गाया गीत ..नमस्ते नमस्ते को भी हाथों हाथ लिया। नरेन्द्र
ंिसह नेगी की पत्नी श्रीमती उषा नेगी के अलावा नवोदित गायिका ज्योति
नैनवाल, सहित अतुल शाह, प्रेम बल्लभ पंत, प्रशांत आदि कलाकारों की
प्रस्तुतियां भी सराही गयी। महोत्सव की सायं तब और ज्यादा यादगार बनी जब
गढ़वाल में अपनी विशेष पहचान रखने वाले हास्य कलाकार घनानंद घन्ना भाई ने
दर्शकों को अपने चूटकलों से जमकर गुदगुदाया। ओम प्रकाश सेमवाल के सफल
संचालन में चले कार्यक्रम में इससे पूर्व संध्या का उद्घाटन करते हुए
मेलाधिकारी/संयुक्त मजिस्ट्रेट केके निराला ने दीप प्रज्वलित कर किया।
उन्होंने कहा कि चमोली जनपद के लोगों के लिए खुशी की बात है कि महोत्सव का
आयोजन इस जनपद में हुआ है।

 


लोक संस्कृति व साहित्य के...
Posted On 23/11/2007 01:10:40

अल्मोड़ा। मौजूदा दौर में कुमाऊँनी व गढ़वाली साहित्य सृजन की बयार तो
अच्छी चल ही रही है, उसके अंदर खुशबू भी कम अच्छी नहीं है। जिस प्रकार
युवा पीढ़ी का रचना संसार व्यापकता लिए हुए चल रहा है, निश्चित ही यह
भविष्य के अच्छे संकेत दिखाई देते है। यह कहना आधुनिक कुमाऊँनी कविता के
युगपुरुष कहे जाने वाले शेर सिंह बिष्ट 'अनपढ़' का।

 


श्री अनपढ़ यहां जागरण से एक विशेष वार्ता में बात कर रहे थे। उनका
कहना था उत्तराखण्ड के कुमाऊँनी व गढ़वाली साहित्य का भविष्य इसलिए
उज्ज्वल दिखाई देता है कि आज विद्वान लोग लिख रहे है और सोच रहे है।
उन्होंने अपने दौर का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय अनपढ़ कवि हुआ करते
थे। मौजूदा दौर में बुद्धिजीवियों की भागीदारी से लोक संस्कृति व साहित्य
में चार-चांद लगेंगे, यही उम्मीद हमें करनी चाहिए। शेरदा से यह पूछने पर
कि आप उम्र के कितने बसंत पार कर चुके है। सहज भाव से शेरदा ने कहा, 'ठीक
से याद नहीं, 80 के चक्कर में फंस गया लगता हूं।'


 

सरकार द्वारा लोक साहित्य व संस्कृति के लिए कोई रुझान न होने की पीड़ा
शेरदा की बातों में दिखाई दी। उन्होंने कहा न तो नेता और न ही सरकार
कुमाऊँनी व गढ़वाली के रचना संसार की ओर देख रही है। उनका कहना था कि इसका
दु:ख केवल मुझे ही नहीं सारे सृजनकार इनकी उपेक्षा से आहत है। नई पीढ़ी को
संदेश देते हुए उन्होंने कहा किसी भी रूप में वह कर्मठता व लगनशीलता के
साथ आगे बढ़ने की उनमें ललक हो यह कल के लिए जरूरी है।


 

अंत में अपनी दो पंक्तियां कुछ इस प्रकार सुनाई- 'गुणों में सौ गुण
भरिया, म्यार पहाड़ाक् नानतिनो। य दूनि में गुणें चैनी, म्यार पहाड़ाक्
नानतिनो'।

 


उत्तराखंडी राम लीला के कुछ...
Posted On 15/11/2007 22:56:49

दोस्तो जैसे आप
सभी लोगों को पता है की रामलीला और अन्य धार्मिक
, सामाजिक नाटक जिनका
मंचन हमारे देश
, गॉव और शहरौं मैं बहुत प्राचीन समय से होता चला आ रहा
है और हम सभी लोग इनका आनंद बड़े चाव से लेते है . हमारे उतराखंड मे राम लीला का
एक अलग ही महत्व है और इसकी एक अलग ही पहिचान है. वैसे तो राम लीला का मंचन देश के
हर भाग मे होता होगा लेकिन जो राम लीला हमारे गॉव या कहे की उतराखंड मे होती है
, उसकी
एक अलग ही पहिचान और एक अलग ही स्वाद है. अभी तक आप लोगों ने केवल हिन्दी काब्या
और गद्य मे ही राम लीला देखी होगी और सुनी होगी लेकिन क्या कभी आपने अपनी बोली मे
राम लीला का स्वाद लिया
? हमारे उतराखंड की अपनी बोली मे कभी आपने
राम लीला का मंचन होते हुए देखा
? जहा तक मे समझता हू किसी ने भी अभी तक अपनी
बोली मे इसका स्वाद नही लिया होगा
, लेकिन दोस्तो मे अपने को बड़ा भाग्यवान
मानता हू की मैंने अपनी बोली मे इसका स्वाद लिया हुआ है और कई बार हम लोग इसका
मंचन अपने गॉव मे कर चुके है.







मैं यहा कुछ अंश अपनी याददास्त के आधार पर
समेटने की कोशिश कर रहा हू.





कुछ अंश इस प्रकार है.





जब सीता सवाय्म्बर की
तयारी होंदी और सवायाम्बर मा शिवजी कु दनुष क्वे नि तोडी सक्दु
, तब रजा जनक बहुत ही ज्यादा निराश ह्वे जान्दा
और ग़ुस्सा भी ह्वे जान्दा
, तब सी क्या बोल्दा





जवा बै जवा तुम सब
घौर जवा
,

तुम सब लोडया बैक छीन,

बात करीदां लंबी चोडी,

दयोंन्दा खोले पटाल फ़ोडी





जब सीता धनुष को
उठाकर कहीं दूसरी जगह रख लेती हैं. तब दोनों के बीच का सम्वाद्-





जनक - शिवजी को प्यारू धनु कैन उठाये
बाबा
,

बोला री बाबा ईथै कैन उठाये





पीडयौं बीतीक च्ल्यां, कभी नी हिलाये अज्यौं





जादू कु हाथ फ़ैरी,



कैन उठाये





सीता - मिन सदानी मंदिर मा सूनी छये,   बात  जु





शिवजी शंकर को धनु भारी छयो
जाति को





कुणजै की लाटी ज्न, मीन उठाये बाबा





जनक - बोला री बाबा ईथै कैन उठाये





जब राम, लक्षम्ण और सीता वन में जाते है , तब राम कहते हैं-





देख भुला लक्षमन
तू
,



कन स्वाणा बौंण छन





डाली छिन बोटी छिन





घुघुती हैलास छिन





जब शूर्पणखा राम के
सामने शादी का प्रस्ताव रखती है
, तब राम लक्षम्न की ओर संकेत करके शूर्पणखा से कहते हैं





झपन्याली जटा तेरी
रुग बुग्या सी आंखी





कती स्वाणी लगदी,



छोटु भुला लक्षम्न भलु गौरु भलु
स्वाणु





भलु बाणु गौरु लगदु





जब पहली बार सीता
राम और लक्षम्न को बाग में देखती है
, तो अगले दिन अपनी सखियौं से कहती है





यार दिदी ब्याली छा





नौना दवी बाग मा





गौरा छया सौला छया,



रौतेला राग मा





और बहुत कुछ आगे है पर मुझे
भी याद नही है.


पहाडी संगीत विकास या पतन की...
Posted On 15/11/2007 02:20:30

दोस्तो जब मैं कभी अपने पहाडी संगीत के बारे मे सोचता
हू तो बड़ी दुविधा मे पड़ जाता हू . हम लोग कह रहे है की हमारा संगीत विकास के पथ पर
आगे बढ रहा है
, हम
संगीत के छेत्र मे बहुत विकास कर रहे है या बहुत विकास कर लिया है
, लेकिन मेरा मन ये कतई  स्वीकार करने को तयार नही है की वास्तव मे
हमारा संगीत विकास की ओर बढ रहा है.

 





इसी विषय पर मैं अपने कुछ विचार आप लोगों के बीच बाटना
चाहता हू
, हो सकता है की मैं 
मेरी सोच ग़लत भी हो
, ये
सब आप लोग ही मुझे बताएँगे.







आज जैसे हम सभी लोग जानते है की हमारा अपना पहाडी
संगीत किस दिशा की ओर जा रहा है
, मेरे
अपने विचार से हम कही न कही अपने रास्ते से भटक रहे है या भटकने की कोशिश कर रहे है.
आज हमारे पहाडी संगीत पर बाजारवाद का पूरा प्रभाव हो गया है या कहें  की बाजारवाद ने
हमारे संगीत को पूरी तरह से अपनी मुट्ठी मे
जकड लिया है.

 





आज आप १० साल पुराने या ५ साल पुराने पड़ी संगीत को
सुनिए और आज के संगीत को सुनिए
, कितना
परिवर्तन आ गया है. कहते है कि परिवर्तन समय कि मांग होती है या परिवर्तन संसार का
नियम है
, मैं
भी बिल्कुल इस बात से इतेफाक रखता हू
, लेकिन
ये कैसा परिवर्तन है जो हमारी संस्कृति
, हमारी
बोली / भाषा/ शब्द
, हमारे
वाध्य यन्त्र को हमसे दूर लेते जाएं
, क्या
ये परिवर्तन हमारे लिए अच्छा है
?

 





आज कि हमारी युवा पीढ़ी मे दिन प्रतिदिन कई नोजवान गायक-गायिकाएँ, गीतकार आ रहे है और अपने संगीत को हमारे सामने परोश रहे
है
, लेकिन
क्या उनमे कुछ गुणवत्ता है
?, क्या
उनमे हमारे समाज को कुछ संदेश है
? क्या
उस संगीत से हम कुछ शिक्षा ले रहे है
?, इसका
उतर के आप लोग ही दे सकते है.

 





आज हमारे पहाडी संगीत मे हमारी संस्कृति, सभ्यता, बोली
शब्द देखने को बहुत ही कम मिल रही है या यू
कहें कि धीरे धीरे ये चीजें पहाडी संगीत से दूर होती जा रही है. हमको वो चीजें परोशी
जा रही है है जो केवल भौतिक द्रश्त्ति से उपयोगी है न कि सामाजिक द्रश्त्ति  से.







क्या आपने कभी इस बारे मे सोचा कि क्यो आज भी लोग श्री
नरेंदर सिंह नेगी जी
, स्वर्गीय
श्री बाबु राम गोस्वामी और अन्य पुराने गायको को सुनने के लिए लालायित रहते है
? क्यौकी वह हमारी संस्कृति, सभ्यता, भाषा/बोली
के बहुत ही नजदीक था और है
, उनमे
हमारी सभ्यता झलकती है
, हमारे
समाज को कुछ संदेश मिलता है
, उनसे
हमने बहुत कुछ सीखा और आगे भी सीखते रहेंगे
, लेकिन
वही संगीत आज कितना दूषित हो गया है
, उसको
मे शब्दों मे बयां नही कर सकता.

 





आज का हमारा संगीत जो तयार होता है वो केवल बाजार को
ध्यान मे रख किया जाता है न कि समाज को ध्यान मे रख कर. आज का हमारा पहाडी संगीत
केवल शादी ब्याह के अवसरों पर नाचने गाने तक
ही सीमित रह गया है और वही संगीत हमारे बाजार मे सुपर हिट माना जाता है जिसमे थोड़ा
बहुत नाच ठुमके दिखाने का मोका मिले
, चाहे
हमको उसके बोल समझ ने न आ रहे हो
, चाहे
उसमे हमारी भाषा - बोली न हो और चाहे उसमे हमारी संस्कृति सभ्यता न झलकती हो.हमको तो
केवल नाचने के लिए मिलना चाहिए.

 







जब पहाडी संगीत मे वीडियो का दौर शुरू हुआ था तो आप
लोगों ने देखा होगा कि किस प्रकार उन वीडियो मे हमारी सभ्यता संस्कृति झलकती थी
, कैसे एक वीडियो एक ही अपनी परम्परागत पहिनावे (ड्रेस) मे शूट हो जाता था, लेकिन धीरे धीरे एक गाने को फिल्माने के लिए पहिनावे बदलते
गए. पहले हमारे यहा पाखुले और कुरता सलवार पहनकर वीडियो शूट होता था
, धीरे धीरे फेंसी साड़ी, मोर्डेन ड्रेस और अब तो मैंने कई वीडियो मे जींस शर्ट
और टॉप स्कर्ट मे भी वीडियो देखें है. और अगर यही दौर चलता रहा तो आगे हम २ पीस पहिनावे
तक न पहुच जायें.

 





हमारा संगीत धीरे धीरे बोलीवुड कि तर्ज पर आगे बढ़ रहा
है
, जैसे
आप लोगों को पता ही होगा कि पहले दौर वाली हिन्दी फिल्में कैसी होती थी और आज के
दौर वाली कैसी है और कैसी बन रही है
, ये
मुझे बताने कि जरूरत नही है.





तो सवाल ये उठता है कि क्या हम वास्तव मे अपने पहाडी
संगीत को उचित सम्मान दिला रहे है या उसको पतन कि ओर धकेल रहे है
?

 





मैं ये नही कह रहा हू कि हमारा संगीत पूरी तरह से पतन
कि ओर जा रहा है या दूषित हो रहा है
, कुछ
ऐसे भी कलाकार है जो हमको एक अलग पहिचान दिलाने कि कोशिश कर रहे है या कर चुके है
, उनके उदाहरण आप लोगों के सामने है श्री नरेंदर सिंह नेगी, स्वर्गीय श्री बाबु राम गोस्वामी और कई ऐसे भी है जो
अंधेरे मे कही गम है या हो गए है.

 





मेरा हमेशा से यही सोचना रहा है कि हमें हमेशा
सकारात्मक परिवर्तन को ग्रहण करना चाहिए न कि नकारात्मक परिवर्तन को. अगर हम इसी
रह पर चलते रहेंगे तो वह दिन दूर नही जब हमारे संगीत से उत्तराखंडी सभ्यता भाषा
बोली बिल्कुल लुप्त हो जायेगी और तब हमारी क्या पहिचान होगी
? हम कैसे गर्व से कहेंगे कि हम उत्तराखंडी है, जहा पर देवता लोग निवास करते थे और कर रहे है.

 





अंत मे केवल इतना ही कहना चाहूँगा कि यदि बाजार को
मध्य नज़र रखते हुए हम अपने संगीत कि तुलना करें तो मैं भी अवश्य कहूँगा कि हम
विकास कर रहे है लेकिन यदि समाज को मध्य नज़र रखते हुए तुलना करू तो मे समझता हू कि
हम पतन कि ओर अग्रसर हो रहे है.

 





बाकी आप लोग क्या सोचते है, अपने विचार जरूर बताएँगे.




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